इस पोस्ट में आपको भक्ति रस किसे कहते हैं, भक्ति रस के भेद, Bhakti Ras Ka 20 Udaharan or Paribhasha के बारे में डिटेल में बताने वाले है तो पोस्ट को अंत तक ज़रूर पढ़े.
भक्ति रस किसे कहते हैं :-
जब किसी काव्य मैं भगवान की कृपा का वर्णन हो या फिर किसी प्रसंग को सुनकर भगवान के प्रति श्रद्धा या समर्पण का भाव उत्पन्न होता है तो उसे भक्ति रस कहते हैं.
जब कोई भक्त भगवान के नाम, रूप या लीला का स्मरण करते हुए आंसू बहाता है, रोमांचित हो उठता है या स्वयं को भूलकर उनकी आराधना में लीन हो जाता है तो इसी अवस्था को भक्ति रस कहा जाता है।
अर्थात भगवान की भक्ति करने में या फिर भगवान की स्तुति में जो श्रद्धा या समर्पण का भाव उत्पन्न होता है और उससे हमें आनंद की अनुभूति होती है तो वह भक्ति रस कहलाता है.
भक्ति रस के भेद (प्रकार) :-
भक्त और ईश्वर के बीच के संबंध के आधार पर भक्ति रस को पांच भागो में बांटा गया है :-
शांत भक्ति :-
भक्त ईश्वर के प्रति बिना किसी विशेष सांसारिक संबंध के, निर्विशेष श्रद्धा और शांत समर्पण भाव से आराधना करता है तो वहा शांत भक्ति रस होता है.
दास्य भक्ति :-
भक्त स्वयं को ईश्वर का सेवक मानकर सेवा-भाव से भक्ति करता है जैसे हनुमान का राम के प्रति भाव इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
सख्य भक्ति :-
भक्त ईश्वर को मित्र के रूप में देखता है और सखा-भाव से संबंध स्थापित करता है जैसे सुदामा का कृष्ण के प्रति भाव इसका श्रेष्ट उदाहरण है.
वात्सल्य भक्ति :-
भक्त ईश्वर को संतान रूप में देखकर मातृ-पितृ स्नेह से भक्ति करता है जैसे यशोदा का बाल कृष्ण के प्रति वात्सल्य होता है।
माधुर्य (कांता) भक्ति :-
भक्त स्वयं को प्रिया मानकर ईश्वर के प्रति प्रेमिका जैसा समर्पण भाव रखता है जैसे गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम इसका एक अच्छा उदाहरण है।
भक्ति रस का स्थाई भाव रति होता है
भक्ति रस में अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा और समर्पण, ईश्वर विषयक प्रेम, आलोकिक शक्ति, प्रभु के प्रति समर्पण की भावना इस रस में पाए जाते हैं.

भक्ति रस के उदाहरण : Bhakti Ras Ka 20 Udaharan
उदाहरण : 1
- सेवक सेव्य भाव बिनु भाव न तरिय उदगारी
- तू दयाल दींन सौ तू दानी हौं भिखारी
- हों प्रिसिद्ध पातकी, तू पाव पुंज हारी
- जाको हरि दृढ करी अंग करयो
व्याख्या सहित:- इस उदाहरण में श्री राम की प्रति दयालुता, उनके प्रति वात्सलता का भाव, श्री राम की महिमा का गुणगान आदि भक्ति भाव उत्पन्न होता है अतः इस उदाहरण में भक्ति रस होता है.
उदाहरण : 2
- जाको हरि वृढ़ करि अंग कर्यो ।
- सोइ सुसील, पुनीत, बेद-बिद विद्या-गुननि भर्यो ।
- उतपति पांडु-सुतन की करनी सुनि सतपंथ डर्यो ।
- ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन पज सुनि-सुन लोक तर्यो ।।
- जो निज धरम बेद बोधित से करत न कछु बिसर्यो।
- बिनु अवगुन कृकलासकूप मज्जित कर गहि उधर्यो।
व्याख्या सहित:- इस उदाहरण में श्री राम की महानता, उनके प्रति लगाव का भाव, श्री राम के आदर्शो का गुणगान आदि भक्ति भाव उत्पन्न होता है अतः इस उदाहरण में भक्ति रस होता है.
उदाहरण : 3
- वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, कर किरपा अपणायो।
- जनम-जनम की पूँजी पाई, जग मैं सबै खोवायो।
- खरचै न खुटै, कोई चोर न लूट, दिन-दिन बढ़त सवायो।
- सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तरि आयो।
- न ‘मीरा’ के प्रभु गिरधर नागर, हरष-हरष जस गायो।
व्याख्या सहित:- इस उदाहरण में मीराबाई भगवान कृष्ण के प्रति अपने भक्ति भाव को प्रदर्शित कर रही है और यह समर्पण कर रही है कि भगवान कृष्ण की इस भवसागर से तार सकते हैं वही मेरे गिरधर नागर हैं इस प्रकार के भक्ति भाव उत्पन्न हो रहे हैं अतः इस रस में भक्ति रस है.
उदाहरण : 4
प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी
जाकी गंध अंग-अंग समाही।
उदाहरण : 5
- जब-जब होइ धरम की हानी।
- बाहिं असुर अधम अभिमानी।।
उदाहरण : 6
- तब-तब प्रभु धरि मनुज सरीरा।
- हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।।
उदाहरण : 7
उलट नाम जपत जग जाना,
वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।
उदाहरण : 8
- काको नाम पतित पावन जग, केहि अति दीन पियारे।
- कौने देव बराइ बिरद हित हटि-हठि अधम उधारे।
- देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब माया विवस बिचारे।
- तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे।
उदाहरण : 9
जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी
फूटा कुम्भ, जल जलही समाया, इहे तथ्य कथ्यो ज्ञायनी।
उदाहरण : 10
- दुलहिनि गावहु मंगलचार
- मोरे घर आए हो राजा राम भरतार ।।
उदाहरण : 11
- तन रत करि मैं मन रत करिहौं पंच तत्व बाराती।
- रामदेव मोरे पाहुन आए मैं जोवन मैमाती।।
उदाहरण : 12
राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे।
घोर भव-नीर-निधि नाम निज नाव रे।।
उदाहरण : 13
नैनन्हि की करि कोठरी, पुतली पलंग बिछाय।
पलकन्ह की चिक डारि कै, पिय को लिया रिझाया।
उदाहरण : 14
राम-नाम छाड़ि जो भरोसो करै और रे।
तुलसी परोसो त्यागि माँगै कूर कौन रे।।
उदाहरण : 15
ना किछु किया न करि सक्या, ना करण जोग सरीर।
जो किछु किया सो हरि किया, ताथै भया कबीर कबीर|
उदाहरण : 16
राम सौं बड़ो है कौन मोसो कौन छोटो।
राम सौं खरो है कौन मोसो कौन खोटो।।
उदाहरण : 16
यह घर है प्रेम का खाला का घर नाहीं ।
सीस उतारी भुई धरो फिर पैठो घर माहि।।
उदाहरण : 17
उलट नाम जपत जग जाना ।
वल्मीक भए ब्रह्म समाना ।।
उदाहरण : 18
एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास ।
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास ।।
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निष्कर्ष :-
Bhakti Ras इसमें केवल भावुकता नहीं बल्कि एक काव्यशास्त्रीय अवधारणा है जिसका स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के पर टिका है। इस रस का जो भाव जो हमेशा ईश्वर रहेगा, चाहे भाव दास्य, सख्य, वात्सल्य या माधुर्य किसी भी रूप में क्यों न प्रकट हो।
इस पोस्ट में हमने आपको भक्ति रस के उदाहरण के बारे डिटेल में समझाया है और उनकी व्याख्या भी की है इसके जितने प्रकार होते है उनके बारे में भी डिटेल में समझाया है तो यदि पोस्ट अच्छी लगी होतो इसे शेयर करे और इसी प्रकार के लेख के लिए परिभाषा देखो ब्लॉग को बुकमार्क कर लेवे.
Bhakti Ras FAQ:
प्रश्न :- 1 भक्ति रस किसे कहते हैं?
उत्तर :- भक्त का ईश्वर के प्रति स्थायी प्रेम भाव, जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से पुष्ट होकर जो रस प्राप्त होता है, उसे भक्ति रस कहते हैं।
प्रश्न :- 2 भक्ति रस का स्थायी भाव क्या है?
उत्तर :- भक्ति रस का स्थायी भाव रति (भक्ति) है जिसका आलंबन ईश्वर होता है।
प्रश्न :- 3 भक्ति रस के कितने भेद माने गए हैं?
उत्तर :- भाव के आधार पर मुख्यतः पांच भेद माने गए हैं शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भक्ति।
प्रश्न :- 4 क्या सभी आचार्यों ने भक्ति रस को रस के रूप में स्वीकार किया है?
उत्तर :- नहीं। कुछ विद्वान इसे स्वतंत्र रस मानते हैं, जबकि रामचंद्र शुक्ल जैसे समालोचक इसे भाव मानते हैं रस नहीं।
प्रश्न :- 5 भक्ति रस और वात्सल्य रस में क्या अंतर है?
उत्तर :- दोनों रसो में मूल अंतर आलंबन का है वात्सल्य रस में आलंबन सांसारिक संतान होती है, जबकि भक्ति रस में आलंबन ईश्वर ही होता है।