Shant Ras : शांत रस की परिभाषा और उदाहरण व्याख्या सहित

इस पोस्ट में आपको शांत रस किसे कहते है, Shant Ras Ke Udaharan, शांत रस के 10 सरल उदाहरण, शांत रस के भाव और इसके नियम के बारे में आपको बताने वाले है.

शांत रस किसे कहते है ?-

शांत रस में जब किसी प्रसंग में या किसी काव्य में संसार की नश्वरता और परमात्मा के रूप का ज्ञान होने से जो लौकिक विरक्ति की भावना उत्पन्न होती है तो वह शांत रस कहलाता है.

अर्थात किसी प्रसंग में या किसी काव्य को सुनकर हमारे मन में शांति का भाव उत्पन्न हो तो उसे शांत रस कहते हैं. 

जब पाठक या श्रोता के मन में संसार की नश्वरता, माया-मोह से मुक्ति या परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, स्थिर उदासीनता और वैराग्य का भाव जगे तो वहाँ शांत रस होता है तो इस प्रक्रिया को शांत रस कहते है.

शांत रस में विषयों के प्रति अरुचि प्रकट करना, सन्यास ग्रहण करना, संसार को छोड़कर भाग जाना, गृह त्याग करना,  समभाव की अभिव्यक्ति, संसार की अनित्यता का बखान करना, प्रभु को प्राप्त करने का प्रयत्न करना यह सभी भाव इस रस में पाए जाते हैं.

शांत रस के भाव और अंग :-

ये चार विभाव, अनुभाव, संचारी भाव और स्थायी भाव के बारे में बताने वाले है.

शांत रस का स्थायी भाव: निर्वेद या शम

आलंबन विभाव :-

वह आधार जिस पर भाव टिकता है। शांत रस में आलंबन विभाव है जैसे परमात्मा का चिंतन, संसार की क्षणभंगुरता (नश्वरता) और सांसारिक सुखों की निरर्थकता का बोध होता है.

उद्दीपन विभाव :-

ऐसा भाव जो स्थायी भाव को उभारती और तीव्र करती हैं जैसे सत्संग, तीर्थ स्थल, एकांत, शमशान का दृश्य, किसी प्रियजन की मृत्यु या सांसारिक विफलता जो व्यक्ति को आत्म-चिंतन की ओर धकेलती है।

अनुभाव :-

ऐसा भाव जो बाहरी संकेत जैसे संसार से विरक्ति, ध्यान-साधना में लीन होना, मौन, संयमित आचरण या सांसारिक वस्तुओं के प्रति उदासीनता को दर्शाता है.

संचारी भाव :-

ये भाव आते-जाते रहते हैं फिर स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं जैसे स्मृति, धृति (धैर्य), ग्लानि, चिंता, और निर्वेद स्वयं भी कभी-कभी संचारी भाव के रूप में काम करता है।


शांत रस के महत्वपूर्ण तथ्य :-

बिंदुउत्तर
स्थायी भावनिर्वेद (मम्मट का मत) / शम (धनंजय का मत)
आलंबन विभावपरमात्मा-चिंतन, संसार की नश्वरता
उद्दीपन विभावसत्संग, तीर्थ, एकांत, वैराग्य-उद्दीपक दृश्य
अनुभावविरक्ति, ध्यान, मौन, संयम
नवरस में स्थाननौवां रस (बाद में जोड़ा गया)
स्वीकृति देने वाले आचार्यआनंदवर्धन (ध्वन्यालोक)
प्रमुख उदाहरण कविकबीरदास, जयशंकर प्रसाद
Shant Ras Ka 10 Udaharan

शांत रस के उदाहरण- Shant Ras Ka 10 Udaharan

उदाहरण- 1

  • वन वितन रवि ससि दियो 
  • फल भराव सलिल प्रवाह
  • अवनिसेज पंखा पवन
  • अब न कछु परवाह

व्याख्या सहित- उदाहरण में कवि नेअंतरिक्ष रूपी किताब में प्रभु की झांकी, चमकते हुए सूर्य और चंद्रमा,बहता हुआ जल और प्राकृतिक के तत्वों का सौंदर्य का वर्णन किया है जो कि यह सभी शांत रस के भाव होते हैं इसलिए इस उदाहरण में शांत रस है.

उदाहरण- 2

  • भाग रहा हूं भार देख
  •  तू मेरी और ने हर देख
  •  मैं त्याग चला निसार देख
  • अटकेगा मेरा कौन काम
  • ओ क्षण भंगुर भव राम राम
  • प्रसन्न रोग है प्रकट योग
  •  संयोग मात्र भावी वियोग
  • हां लोग में ही लीन लोग 
  • भूले  हैं अपना परिणाम
  • ओ क्षण भंगुर भव राम राम

व्याख्या सहित- इस उदाहरण में कवि ने संसार की क्षणभंगुरता, घर को छोड़कर भागने की बात कहना, लोगों के दुष्परिणामों को जाने बिना लोभ, मोह में लीन होने का कथन कहना, संसार से विदा मांगना यह सभी शांत रस के भाव होते हैं अतः इसमें शांत रस है.

उदाहरण- 3

  • सोच रहे थे जीतन सुख है, ना यह विकट पहेली है 
  • भाग अरे मनु इंद्रजाल से कितनी व्यथा ना झेली है
  • श्रद्धा के रहते यह संभव नहीं की कुछ कर पाऊंगा
  • तो फिर शांति मिलेगी मुझको जहां खोजना जाऊंगा

व्याख्या सहित- उदाहरण में जीवन जीतने को विकट पहेली बताना, जीवन में सुख का ना होना, संसार से भागने का विचार करना, शांति की खोज के लिए उत्सुक होना सभी इस उदाहरण में शांत रस के भाव हैं अतः इसमें शांत रस है.

उदाहरण- 4

  • धूम समूह निरखि-चातक ज्यौं, तृषित जानि मति धन की।
  • नहिं तहं सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की।

उदाहरण – 5

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं
सब अंधियारा मिट गया जब दीपक देख्याँ माहीं।।

उदाहरण – 6

लम्बा मारग दूरि घर विकट पंथ बहुमार |
कहौ संतो क्युँ पाइए दुर्लभ हरि दीदार ||

उदाहरण – 7

ज्यौं गज काँच बिलोकि सेन जड़ छांह आपने तन की।
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की।।

उदाहरण – 8

मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूँद बिनसि जाए छिन में, गरब करे क्या इतना॥

उदाहरण – 9

कहं लौ कहौ कुचाल कृपानिधि, जानत हों गति मन की।
तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की।।

उदाहरण – 10

भरा था मन में नव उत्साह सीख लूँ ललित कला का ज्ञान
इधर रह गंधर्वों के देश, पिता की हूँ प्यारी संतान।

उदाहरण – 11

बैठे मारुति देखते राम चरणाबिंद।
युग अस्ति-नास्ति के एक रूप गुण गुण अनिंद्य।।

उदाहरण – 12

अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।
राम कृपा भव-निसा सिरानी, जागै फिरि न डसैहौं ॥
पायौ नाम चारु-चिन्तामनि, उर-करते न खसैहौं।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, उर-कंचनहि कसैहौ ॥
परबस जानि हस्यौ इन इन्द्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं ।
मन-मधुकर पन करि तुलसी, रघुपति पद-कमल बसैंहौं ।।

उदाहरण – 13

तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत,
वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश
बताओ यह कैसा उद्वेग?

उदाहरण – 14

मन फूला फूला फिरै जगत में कैसा नाता रे।
चार बाँस चरगजी मँगाया चढ़े काठ की घोरी।
चारों कोने आग लगाया फूँकि दिया जस होरी।
हाड़ जरै जस लाकड़ी केस जरै जस घास।
सोना जैसी काया जरि गई, कोई न आए पास।।

उदाहरण – 15

कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगौ।
श्री रघुनाथ-कृपालु-कृपा तें सन्त सुभाव गहौंगो।
जथालाभ सन्तोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो।
परहित-निरत-निरंतर, मन क्रम वचन नेम निबहौंगो।

उदाहरण – 16

मोरी चुनरी में परि गयो दाग पिया।
पाँच तत्त की बनी चुनरिया सोरहसै बंद लागे जिया।
यह चुनरी मोरे मैके ते आई ससुरे में मनुवाँ खोय दिया।
मलि मलि धोई दाग न छूटै ज्ञान को साबुन लाय पिया।
कहें कबीर दाग तब छुटि हैं जब साहब अपनाय लिया।

यह भी पढ़े :-

श्रृंगार रस हास्य रस
वीर रस  रौद्र रस 
शांत रसभक्ति रस

निष्कर्ष :-

शांत रस को समझने के लिए इसमें स्थायी भाव (निर्वेद/शम), नाट्यशास्त्र में इसको बाद में जोड़ा गया और कबीर व जयशंकर प्रसाद लेखको द्वारा जैसे उदाहरण देखने को मिले है .

इस पोस्ट में हमने आपको शांत रस की परिभाषा के साथ में शांत रस का उदाहरण को व्याख्या सहित समझाया है और Shant ras से जुडी सभी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है.

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Shant ras FAQ :-

प्रश्न :- 1 शांत रस का स्थायी भाव क्या है?

उत्तर :- अधिकांश आचार्यों के अनुसार निर्वेद, और आचार्य धनंजय के अनुसार शम

प्रश्न :- 2 शांत रस को नवां रस क्यों कहा जाता है?

उत्तर :- क्योंकि भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मूल रूप से केवल आठ रस बताए गए थे फिर शांत रस को बाद में जोड़ा गया जिससे यह नौवां रस बना।

प्रश्न :- 3 शांत रस और करुण रस में क्या अंतर है?

उत्तर :- करुण रस किसी विशेष प्रसंग या हानि पर हुए दुख पर आधारित है, जबकि शांत रस संसार की समग्र नश्वरता के बोध और वैराग्य पर आधारित है.

प्रश्न :- 4 शांत रस को सबसे पहले किसने स्वीकृति दी?

उत्तर :- आचार्य आनंदवर्धन ने अपने ग्रंथ ध्वन्यालोक में शांत रस को रस के रूप में स्पष्ट स्वीकृति दी।

प्रश्न :- 5 शांत रस के उदाहरण किन कवियों की रचनाओं में मिलते हैं?

उत्तर :- सबसे प्रामाणिक उदाहरण कबीरदास के वैराग्यपूर्ण दोहों और जयशंकर प्रसाद की छायावादी रचनाओं में मिलते हैं।

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