Anupras Alankar : अनुप्रास अलंकार परिभाषा, भेद और 20 उदाहरण

अगर आप अनुप्रास अलंकार की परिभाषा और उदाहरण खोज रहे हैं तो यहाँ आपको Anupras Alankar In Hindi, अनुप्रास अलंकार किसे कहते हैं, इसकी पहचान कैसे करे, अनुप्रास अलंकार के भेद, Anupras Alankar के 10 उदाहरण और अनुप्रास, यमक-श्लेष के अंतर बताने वाले है.


अनुप्रास अलंकार: परिभाषा, भेद, नियम और 20 उदाहरण

अनुप्रास अलंकार की परिभाषा (अर्थ सहित)

‘अनुप्रास’ शब्द दो हिस्सों से बना है: अनु (बार-बार) और प्रास (वर्णों या ध्वनियों का आना) अर्ताथ बार-बार वर्णों का आना।

परिभाषा: जहाँ काव्य में किसी वर्ण (मुख्यतः व्यंजन) या वर्ण-समूह की आवृत्ति एक से अधिक बार हो और उससे ध्वनि का सौंदर्य बढ़े, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

जैसे :- “चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में।”

इस पंक्ति में ‘च’ की ध्वनि बार-बार आती है और पंक्ति में अपने आप एक लय बन जाती है। इसी लय में अनुप्रास अलंकार है।

“रघुपति राघव राजा राम।”

इसमें ‘र’ की ध्वनि बार-बार आई है, इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

  • यह शब्दालंकार है यानी इसकी सुंदरता शब्दों की ध्वनि पर टिकी है न की अर्थ पर।

अनुप्रास अलंकार की पहचान कैसे करें?

  1. पंक्ति को ज़ोर से पढ़िए और देखिए कि कोई व्यंजन या व्यंजन-समूह बार-बार सुनाई देता है या नहीं।
  2. आवृत्ति कम से कम दो बार होनी चाहिए। एक बार आया वर्ण अनुप्रास अलंकार नहीं बनाता।
  3. मात्रा बदलने से फ़र्क़ नहीं पड़ता जैसे ‘तरनि’, ‘तनूजा’, ‘तट’ में स्वर अलग-अलग हैं, फिर भी ‘त’ की आवृत्ति मान्य है।
  4. अगर पूरा शब्द दोहराया गया है और हर बार उसका अर्थ अलग है तो वह अनुप्रास नहीं यमक अलंकार है।

अनुप्रास अलंकार की विशेषताएँ

  • यह शब्दालंकार है।
  • इसमें संगीतात्मकता और प्रवाह पाया जाता है, इसलिए कविता, दोहे, चौपाई और सवैये में पाया जाता है।
  • एक वर्ण की बार- बार आवृत्ति ज़रूरी नहीं कई वर्णों का समूह भी दोहराया जा सकता है।
  • आवृत्ति के ढंग के आधार पर इसके पाँच भेद माने जाते हैं।
  • आवृत्ति स्वाभाविक होनी चाहिए ज़बरदस्ती ठूँसे गए शब्द काव्य को बोझिल बना देते हैं।
Anupras Alankar

अनुप्रास अलंकार के भेद

अनुप्रास अलंकार के प्रकार –

  • 1. छेकानुप्रास, 
  • 2. वृत्यानुप्रास, 
  • 3. श्रुत्यनुप्रास, 
  • 4. अन्त्यानुप्रास, 
  • 5. लाटानुप्रास

1. छेकानुप्रास

जहां एक ही चरण में दो या दो से अधिक वर्णों की आवृत्ति कुछ अन्तर पर हो छेकानुप्रास अलंकार होता है इस प्रकार के वर्णों या शब्दों का प्रयोग आदि, मध्य, अन्त में, कहीं भी हो सकता है.

छेकानुप्रास अलंकार के उदाहरण-

उदाहरण- 1

  • इस करुणा कलित हृदय में
  • क्यों विकल रागिनी बजती

निम्न उदाहरण में क वर्ण की आवृति हुयी है जो प्रारम्भ, मध्य और अंत में भी हुयी है.

उदाहरण- 2

  • कानन कठिन भयंकर भारी
  • घोर घाम हिम वारि बयारी

उपर्युक्त उदाहरण में क, घ वर्ण की आवृति हुयी है जो प्रारम्भ, मध्य और अंत में भी हुयी है.

उदाहरण- 3

अति आनन्द मगन महतारी

उपर्युक्त उदाहरण में अ, म वर्ण की आवृति हुयी है जो प्रारम्भ, मध्य और अंत में भी हुयी है.

उदाहरण- 4

  • चेतकर चलना कुमारग में कदम धरना नहीं 
  • बोधवर्द्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं

उपर्युक्त उदाहरण में च, ल, क वर्ण की आवृति हुयी है जो प्रारम्भ, मध्य और अंत में भी हुयी है.

उदाहरण- 5

मोहनी मूरत साँवरी सूरत, नैना बने बिसाल

निम्न उदाहरण में म, स, ब वर्ण की आवृति हुयी है जो प्रारम्भ, मध्य और अंत में भी हुयी है.

उदाहरण- 6

  • बन्दौं गुरु पद पदुम परागा। 
  • सुरूचि सुवास सरस अनुरागा।।

निम्न उदाहरण में प, स, वर्ण की आवृति हुयी है जो प्रारम्भ, मध्य और अंत में भी हुयी है.

उदाहरण- 7

  • लपट से भाट रूख जले-जल
  • नदी नद घाट सूख चले-चले

2. वृत्यनुप्रास

जहाँ एक या एक से अधिक वर्ण की आवृत्ति क्रमानुसार हो तो वहाँ वृत्यनुप्रास अलंकार होता है।

ये वृत्तियाँ तीन प्रकार की होती हैं:-

  • 1. कोमल, 
  • 2. मधुरा, 
  • 3. कठोरा। 
  • कोमलावृत्ति में ट वर्ग को छोड़कर अन्य व्यंजन आते हैं। 
  • मधुरा वृत्ति में य, प. क, वर्ग, य, र, ल, व वर्ण की आवृत्ति होती है। 
  • कठोरा वृत्ति में ट वर्ग के कठोर वर्गों की बार-बार आवृत्ति होती है.

छेकानुप्रास अलंकार के उदाहरण-

उदाहरण- 1

रघुनन्द आनन्द कन्द कौशल चन्द दशरथ नन्दनं  

(न्द वर्ण की मधुर वर्ण आवृत्ति हुई है)

उदाहरण- 2

भव्य भावों में भयानक भावना भरना नहीं 

(भ वर्ण)

उदाहरण- 3

  • कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि
  • कहत लखन सन राम हृदय गुनि 

(क, न, वर्ण) 

उदाहरण- 4

कोमलावृत्ति के उदाहरण- –

बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय

(ल वर्ण)

कठोरावृत्ति के उदाहरण- 

उदाहरण- 5

  • सब जाति फटी दुख की दुपटी 
  • कपटी न रहैं जहं एक घटी

(ट वर्ण)


3. श्रुत्यनुप्रास अलंकार

जब एक ही वर्ग के वर्णों की आवृति हो और उच्चारण में बहुत से वर्णों का प्रयोग किया जाय तो वहां श्रुत्यनुप्रास अलंकार होता है।

छेकानुप्रास अलंकार के उदाहरण-

उदाहरण- 1

तुलसीदास सीदत निस दिन देखत तुम्हरि निठुराई

(दन्त्य वर्ण)

उदाहरण- 2

दिनांत था, वे दिननाथ डूबते सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे

(त वर्ण)

उदाहरण- 3

  • जाहि जन पर ममता अति छोहू। 
  • जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू।

(ह. क वर्ण-कण्ठ)

उदाहरण- 4

  • अवनि में तुझको इतनी मिली मधुरता 
  • मृदुता मनहारिता

(प्रियप्रवास)

उदाहरण- 5

  • राम नाम नर केसरी, कनककसिपु कलि काल 
  • जापक जन प्रह्लाद जिमि पालहि दलि सुरताल

उदाहरण – 6

  • कलि केवल मल मूल मलीना 
  • पाप पयोनिधि जन मन मीना

4. अन्त्यानुप्रास अलंकार-

जब किसी पंक्ति के अन्त में एक जैसे स्वर या व्यंजन आते हों तो वहाँ अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है।

छेकानुप्रास अलंकार के उदाहरण-

उदाहरण- 1

  • धीरज धरम मित्र अरु नारी 
  • आपति काल परखिय चारी

उदाहरण- 2

  • जा मलियानिल लौट जा, यहाँ अवधि का शाप 
  • लगे न लू होकर कहीं, तू अपने को आप

उदाहरण- 3

  • पागल सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई 
  • सौ बार धन्य वह एक लाल की माई

उदाहरण- 4

  • चारु चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही थी जल थल में 
  • स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी, अवनी और अम्बर तल में

उदाहरण- 4

सेस, महेस, गनेस, दिनेस, सुरेसतु जाहि निरन्तर ध्यावै

(स वर्ण)


5. लाटानुप्रास अलंकार

जब किसी वाक्य में किसी वर्ण की आवृति दो या दो से अधिक बार हो और प्रत्येक बार उसके अर्थ समान हो तो वहां लाटानुप्रास अलंकार  होता है 

अर्ताथ एक ही शब्द दो बार आया हो किन्तु उस शब्द के अर्थ में कोई अन्तर नहीं पड़ता हो तो वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है।

छेकानुप्रास अलंकार के उदाहरण-

उदाहरण- 1

  • पराधीन जो जन, नहीं सरग नरक ता हेतु 
  • पराधीन जो जन नहीं, सरग नरक ता हेतु

उदाहरण- 2

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरें

उदाहरण- 3

  • पूत सपूत तो क्यों धन संचै?
  • पूत कपूत तो क्यों धन संचै?

उदाहरण- 3

  • राम भजन जाके अहै, विपति सुंमगल ताहि 
  • राम भजन जाके नहीं, विपति सुमगल ताहि 

उदाहरण- 4

  • पूर्वार्द्ध में विपत्ति कर्त्ता सुमंगल पूरक है 
  • उतरार्द्ध में सुमंगल कर्त्ता विपत्ति पूरक है

उदाहरण- 5

हे उत्तरा के धन रहो तुम उत्तरा के पास ही।

उदाहरण- 6

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी

उदाहरण- 7

  • वे घर हैं वन ही सदा, जहँ है बन्धु वियोग । 
  • वे घर हैं वन ही सदा, जहँ नहिं बन्धु वियोग।

उदाहरण- 8

  • पराधीन को है नहीं स्वाभिमान सुख-स्वप्न । 
  • पराधीन जो है नहीं स्वाभिमान सुख-स्वप्न ।

उदाहरण- 9

जननी तू जननी भई विधिसन कछु न बसाइ

उदाहरण- 10

  • मोहन अब मन मांहि है, मोह न अब मन मांहि।
  • हिंदी की पाठ्यपुस्तकों में आम तौर पर पाँच भेद मिलते हैं।

अनुप्रास अलंकार के 10 सरल उदाहरण व्याख्या सहित :-

1. चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में।
स्पष्टीकरण :- ‘च’ की आवृत्ति तीन बार है चाँदनी की चंचलता ध्वनि में सुनाई देती है।

2. कानन कठिन भयंकर भारी। घोर घाम हिम बारि बयारी॥
स्पष्टीकरण :- ‘क’, ‘घ’ और ‘ब’ की आवृत्ति है वन की कठोरता इन ध्वनियों से और गहरी हो जाती है।

3. बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।
स्पष्टीकरण :- ‘प’ की आवृत्ति है (‘पद’, ‘पदुम’, ‘परागा’)। गुरु के चरण-कमल की धूल की वंदना में ध्वनि भी कोमल रहती है।

4. सठ सुधरहिं सत संगति पाई।
स्पष्टीकरण :- ‘स’ की आवृत्ति है सत्संगति से दुष्ट के सुधरने का भाव ‘स’ की मंद ध्वनि से बँध गया है।

5. कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि।
‘स्पष्टीकरण :- क’ और ‘न’ की आवृत्ति है आभूषणों की खनक का आभास होता है।

6. जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल-कदंब की डारन।
स्पष्टीकरण :- ‘क’ की आवृत्ति है कवि यमुना-तट के कदंब पर पक्षी बनकर बसने की साध जताते हैं।

7. रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम।
स्पष्टीकरण :- पहले चरण में ‘र’ की और दूसरे में ‘प’ की आवृत्ति है।

8. मुदित महीपति मंदिर आए।
स्पष्टीकरण :- ‘म’ तीन बार आया है राजा के प्रसन्न होकर महल लौटने का भाव कोमल ध्वनि में उभरता है।

9. चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चाँदनी चौक में चाँदी के चम्मच से चटनी चटाई।
स्पष्टीकरण :- ‘च’ की बार-बार आवृत्ति से वृत्त्यनुप्रास समझने में आसानी होती है।

10. सुबह-सुबह सुनहरी सूरज ने सोए शहर को सहलाया।
स्पष्टीकरण :- ‘स’ की आवृत्ति से सुबह की नरमी महसूस होती है।

यह भी पढ़े :-

संदेह अलंकार भ्रांतिमान अलंकार
अनुप्रास अलंकार

अनुप्रास, यमक और श्लेष में अंतर

तीनों शब्दालंकार हैं, इसलिए इन्हीं के बीच भ्रम होता है।

आधारअनुप्रासयमकश्लेष
क्या दोहराया जाता हैवर्ण या वर्ण-समूहपूरा शब्दशब्द एक ही बार आता है
अर्थ की भूमिकाअर्थ से संबंध नहींहर बार अलग अर्थएक शब्द के कई अर्थ
उदाहरण“रघुपति राघव राजा राम”“कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय”
: पहला ‘कनक’ धतूरा, दूसरा सोना
“रहिमन पानी राखिए,
बिन पानी सब सून”:
‘पानी’ के अर्थ चमक, सम्मान और जल हैं

यानी :– ध्वनि दोहराई गई है तो अनुप्रास, शब्द दोहराया गया है और अर्थ बदलता है तो यमक, शब्द एक है और अर्थ कई हैं तो श्लेष।

निष्कर्ष :-

अनुप्रास की पहचान का एक ही तरीका है की पंक्ति को बोलकर पढ़ें और देखें कि कौन-सी ध्वनि लौट रही है। वर्ण लौटे तो अनुप्रास, पूरा शब्द लौटे और अर्थ बदले तो यमक भेद तय करने के लिए ऊपर की पाँच परिभाषाएँ और उनके उदाहरण दोहरा लेना है।


Anupras Alankar FAQ :-

1. अनुप्रास अलंकार कौन-सा अलंकार है?
यह शब्दालंकार है, क्योंकि इसका सौंदर्य शब्दों की ध्वनि पर निर्भर करता है।

2. अनुप्रास अलंकार के कितने भेद हैं?
हिंदी की पाठ्यपुस्तकों में पाँच भेद मिलते हैं: छेकानुप्रास, वृत्त्यनुप्रास, श्रुत्यनुप्रास, अन्त्यानुप्रास और लाटानुप्रास।

3. क्या अनुप्रास में एक ही वर्ण का दोहराव ज़रूरी है?
नहीं। एक वर्ण दोहराया जा सकता है, और कई वर्णों का समूह भी।

4. अनुप्रास और यमक में मुख्य अंतर क्या है?
अनुप्रास में वर्णों की आवृत्ति होती है और अर्थ से उसका संबंध नहीं होता। यमक में पूरा शब्द दोहराया जाता है और हर बार उसका अर्थ अलग होता है।

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