यह लेख bhrantiman-alankar की परिभाषा, संदेह अलंकार की पहचान, विशेषताओं और भ्रांतिमान अलंकार के 10 उदाहरण व्याख्या सहित, भ्रांतिमान और संदेह अलंकार में अंतर के बारे में आपको समझाने वाले है।
bhrantiman-alankar : भ्रांतिमान अलंकार किसे कहते हैं?
यह अर्थालंकार है, क्योंकि इसका सौंदर्य शब्दों की बनावट में नहीं अर्थ के चमत्कार में है।
भ्रांतिमान अलंकार का अर्थ :- “भ्रांति” यानी भ्रम और “मान” यानी मानना। नाम में ही अर्थ छिपा हुआ है: जहाँ भ्रम के कारण कुछ का कुछ मान लिया जाए वह भ्रांतिमान अलंकार होता है.
परिभाषा: जब दो वस्तुओं में समानता जैसे (रंग, आकार या चमक) के कारण कोई पात्र उपमेय को भूल से उपमान समझ ले और उसी के अनुसार व्यवहार भी करने लगे तब वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।
- उपमेय: जो वास्तव में सामने है और जिसका वर्णन हो रहा है (जैसे – ओस की बूँद)।
- उपमान: जिससे उसकी समानता कर रहे है और जिसे भूल से उपमेय समझ लिया गया है (जैसे मोती)।
जैसे :-
अँधेरे कमरे में खूँटी पर टँगा कोट किसी को इंसान जैसा दिख जाए और वह डरकर चीख पड़े तो यही भ्रांतिमान अलंकार का रूप है। कविता में यह भ्रम कभी हंसिनी को होता है, कभी भौंरे को, कभी किसी भोली नायिका को तो इस प्रकार से भ्रांतिमान अलंकार पाया जाता है.
भ्रांतिमान अलंकार की विशेषताएँ
- समानता आधार होती है- इसमें रंग, रूप, आकार या चमक की समानता का भ्रम पैदा करती है।
- भ्रम पक्का होता है– इसमें पात्र को शक नहीं होता, वह सीधे भ्रम को सही मान लेता है।
- भ्रम के अनुसार क्रिया होती है- हंसिनी चुगने लगती है, नाइन एड़ी मलने लगती है।
- भ्रम पात्र को होता है पाठक को नहीं- इसमें पाठक असलियत जानता है पर फिर पंक्ति में रस पाया जाता है।

भ्रांतिमान अलंकार के 10 उदाहरण स्पष्टीकरण सहित :-
उदाहरण 1.- ओस बिन्दु चुग रही हंसिनी, मोती उनको जान।
स्पष्टीकरण :- उपमेय ओस की बूँदें हैं, उपमान मोती है। हंसिनी बूँदों को मोती जानकर चुग रही है तो यहाँ भ्रम भी हो रहा है और उसके अनुसार क्रिया भी हो रही है।
उदाहरण 2.- भ्रमर परत शुक तुण्ड पर, जानत फूल पलास।
शुक ताको पकरन चहत, जम्बु फल की आस॥
स्पष्टीकरण :- यहाँ भ्रम दोनों तरफ़ से हो रहा है जिसमे जो भौंरा तोते की लाल चोंच को पलाश का फूल समझता है और तोता भौंरे को जामुन का फल समझ रहा है.
उदाहरण 3.- बिल विचार प्रविशन लग्यो, नाग शुँड में व्याल।
काली ईख समझकर, उठा लियो तत्काल॥
स्पष्टीकरण :- यहाँ साँप हाथी की सूँड को बिल समझकर उसमे घुसने लगा और हाथी काले साँप को गन्ना समझकर उठा लेता है।
उदाहरण 4.- पाँय महावर देन को, नाइनि बैठी आइ।
फिरि-फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़त जाइ॥
स्पष्टीकरण :- नायिका की एड़ी पहले से इतनी लाल है कि नाइन को महावर लगा हुआ होने का भ्रम है तो वह बार-बार वही अपनी एड़ी को मलती रहती है।
उदाहरण 5.- बेसर मोती दुति झलक, परी अधर पर आनि।
पट पोंछति चूनो समुझि, नारी निपट अयानि॥
स्पष्टीकरण :- उपर्युक्त उदाहरण में नथ के मोती की चमक होंठ पर पड़ी तो भोली नायिका उसे पान का चूना समझकर आँचल से पोंछने लगती है.
उदाहरण 6.- जानि स्याम को स्याम-घन, नाचि उठे वन मोर।
उदाहरण 7.- विधु वदनिहि लखि बाग में, चहकन लगे चकोर।
उदाहरण 8.- चाँदनी में चमकती रेत को जल समझकर प्यासा हिरन उसी ओर दौड़ पड़ा।
उदाहरण 9.- पानी में झलकते चाँद को थाली समझकर बच्चा उसे उठाने झुक गया।
उदाहरण 10.- अँधेरे में खूँटी पर टँगे कोट को चोर समझकर कुत्ता भौंकने लगा।
भ्रांतिमान अलंकार की पहचान कैसे करे?
- जब कोई पात्र किसी वस्तु को कुछ और समझ रहा है?
- जब वह उसी समझ के अनुसार कुछ कर भी रहा है यानि उसकी प्रतिक्रिया बदल जाती है.
- इसमें भ्रम को पक्का समझ लेता है, यानी “शायद” या “मानो” जैसा भाव नहीं है.
- यदि इस तीनों का उत्तर “हाँ” हो तो भ्रांतिमान अलंकार है। जानि, जानकर, समझकर, समुझि, मानकर जैसे शब्द इसमें अर्थ होता हैं।
भ्रांतिमान और संदेह अलंकार में अंतर :-
| भ्रांतिमान | संदेह | |
|---|---|---|
| मन की स्थिति | पक्का (पर ग़लत) निश्चय | अनिश्चय, दुविधा |
| भ्रम है? | हाँ, और उसके अनुसार क्रिया | हाँ, पर निर्णय नहीं हो पाता |
| संकेत शब्द | जानि, समझकर, मानकर | कि, या, अथवा, किधौं |
| सरल रूप | रेत को जल समझकर दौड़ा | यह रेत है या जल? |
यानी भ्रांतिमान अलंकार में पात्र भ्रम में पड़कर क्रिया कर बैठता है जबकि संदेह में करना है या नही इस दुविधा में ही अटका रहता है।
निष्कर्ष :-
भ्रांतिमान की पहचान तीन चीज़ों से होती है इसमें समानता, पक्का भ्रम और भ्रम के अनुसार क्रिया होती है इनमें से एक भी कम हो तो पद संदेह या उत्प्रेक्षा की ओर झुकता है।
ऊपर के 10 उदाहरण को स्पष्टीकरण लिखिए, फिर मिलाइए उसके बाद संदेह और उत्प्रेक्षा अलंकार पढ़िए क्योंकि येही परीक्षा में इसके साथ पढने से समझ पाते है.
bhrantiman-alankar से पूछे जाने वाले प्रश्न :-
1. भ्रांतिमान अलंकार किसे कहते हैं?
जब समानता के कारण उपमेय को भूल से उपमान समझ लिया जाए और उसी के अनुसार व्यवहार हो तो भ्रांतिमान अलंकार होता है।
2. भ्रांतिमान अलंकार का सबसे आसान उदाहरण क्या है?
अँधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना। और “ओस बिन्दु चुग रही हंसिनी, मोती उनको जान।”
3. भ्रांतिमान शब्दालंकार है या अर्थालंकार?
यह अर्थालंकार है, क्योंकि इसका चमत्कार अर्थ में है।
4. भ्रांतिमान और संदेह में मुख्य अंतर क्या है?
भ्रांतिमान अलंकार में पात्र पक्का निर्णय कर लेता है भले वो ग़लत हो जबकि संदेह में वह “यह है या वह?” की दुविधा में रहता है।
5. भ्रांतिमान में उपमेय और उपमान कौन होता है?
उपमेय वह है जो वास्तव में सामने है जबकि उपमान वह है जिसे भूल से समझा गया।
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