Sandeh Alankar : संदेह अलंकार की परिभाषा और 10 उदाहरण

इस पोस्ट में Sandeh Alankar Ki Paribhasha Udaharan के साथ में संदेह अलंकार किसे कहते है और संदेह अलंकार के 10 सरल उदाहरण अर्थ सहित हिंदी में बताने वाले है.

इसके साथ में आपको इस अलंकार की विशेषताएं, संदेह और भ्रांतिमान अलंकार में अंतर आपको स्पष्ट रूप से बताने वाले है.


संदेह अलंकार किसे कहते है?

जिस काव्य में रूप, रंग और गुण की समानता के कारण किसी वस्तु को देखकर यह सुनिश्चित न किया जा सके कि यह वही वस्तु है, अर्थात् उपमेय में उपमान समझने में अन्त तक शंका बनी रहे तो वहाँ सन्देह अलंकार होता है.

परिभाषा: जब समानता के कारण उपमेय में उपमान का संशय पैदा हो जाए और वह संशय पद के अंत तक बना रहे, निश्चय न हो पाए तो उसे संदेह अलंकर कहते है.

  • उपमेय: जो वास्तव में सामने है और जिसका वर्णन हो रहा है (जैसे किसी का मुख)।
  • उपमान: जिससे उसकी समानता है (जैसे चंद्रमा)।

जैसे :- रात में आसमान में एक चमकती रेखा दिखी। तारा टूटा है या कोई हवाई जहाज निकला है या फिर किसी दीपक की लौ है तो आप तय नहीं कर पाते तो यही “तय न कर पाना” जब कविता में अंत तक बना रहे है तो संदेह अलंकार बनता है।


संदेह अलंकार की पहचान कैसे करे?-

  1. जब दो वस्तुओं की समानता के कारण दुविधा बनी रहे ?
  2. जब पद में उस दुविधा का हल अंत तक नहीं मिलता है ?
  3. जब बोलने वाला सोच में पड़ा रहे यानी कुछ कर नहीं पाता है तो ?

संदेह अलंकार का अर्थ :-

“संदेह” का अर्थ है शंका या अनिश्चय जिसमे कवि ऐसी दुविधा रचता है जो अतं तक सुलझती ही नहीं है।

यह अर्थालंकार है, क्योंकि इसका आकर्षण शब्द की बनावट में नहीं अर्थ की दुविधा में छुपा है।


संदेह अलंकार की विशेषताएँ :-

  • इसमें समानता मुख्य आधार है की दो वस्तुएँ इतनी मिलती-जुलती हैं कि एक को देखकर दूसरी का शक बना रहता है।
  • इसमें दो या अधिक विकल्पों में दुविधा होती है “यह है या वह” वाला भाग पद में रहता है.
  • इसमें निश्चय कभी नहीं होता चाहे पद सवाल पर ही खत्म हो जाता है पर अंत तक जवाब नहीं मिलता।
  • वाचक शब्द होते हैं जैसे कि, या, अथवा, किधौं, किंवा शब्द दुविधा को बनाये रखते हैं। ये हर बार नहीं, कभी-कभी “कहूँ… कहूँ…” जैसे दुविधा बन जाती है।
SANDEH ALANKAR KI PARIBHASHA UDAHARAN

संदेह अलंकार के 10 उदाहरण सहित :-

उदाहरण – 1

सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है?
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है?

व्याख्या :- इस पक्ति में साड़ी और नारी इतनी घुल-मिल गई हैं कि देखने वाला तय नहीं कर पा रहा है, की साड़ी के भीतर नारी है या नारी के भीतर साड़ी है।

उदाहरण – 2

  • कहूं मानवी यदि मैं तुझको तो वैसा संकोच कहाँ?
  • कहूं दानवी तो उसमें है लावण्य की लोच कहाँ,
  • वन देवी समझें तो वह होती है भोली-भाली !
  • तुम्हीं बताओं अतः कौन तुम हे रमणि ! रहस्यवाली?

व्याख्या :- उपरोक्त काव्यांश में यहाँ शूर्पणखा के मायावी रूप को देखकर लक्षमण निश्चय नहीं कर पा रहा एक संदेह बना हुआ है की ये मानवी है, दानवी है या फिर कोई वनदेवी है।

उदाहरण – 3

  • की तुम तीन देव महँ कोऊ,
  • नर नारायण की तुम दोऊ।

व्याख्या :- इस पंक्ति में उपमेय यह तय नहीं कर पा रहा कि त्रिदेवों में से कौनसा नर है या नर-नारायण की जोड़ी की जोड़ी है संदेह बना हुआ है.

उदाहरण -4

  • कज्जल के कूट पर दीपशिखा सोती है,
  • कि श्याम घनमंडल में दामिनी की धारा है?

व्याख्या :- इसमें बताया है की काले पर्वत पर दीये की लौ है या काले बादलों में बिजली की रेखा छाई है तो दोनों की चमक इतनी मिलती है कि निर्णय नहीं होता जो की इसमें वाचक शब्द “कि” है।

उदाहरण -5

  • हरि मुख यह आली।
  • किधौं उग्यो मयंक ?

व्याख्या :- हे सखि यह हरि का मुख है या चन्द्रोदय हुआ है। यहाँ हरि का मुख देखकर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है कि ये हरि ही का मुख है या चन्द्रमा है। हरि के मुख में हरि-मुख और चन्द्रमा दोनों का सन्देह हो रहा है।

उदाहरण – 6

  • यह काया है या शेष उसी की छाया

व्याख्या :- इस पंक्ति में संदेह बना हुआ हिया की सामने दिखने वाली आकृति शरीर है या केवल उसकी छाया यह तय नहीं हो पा रहा है। इसमें वाचक शब्द “या” है।

उदाहरण – 7

5. राधा मुख आलि किंधो, केंधो उग्यो मयंक।

व्याख्या :- ऊपर दिए उदाहरण में संदेह है की ये सखी यह राधा का मुख है या आकाश में चंद्रमा उग आया है इसमें वाचक शब्द “किंधो” और “केंधो” हैं। उपमेय मुख है और उपमान मयंक है.

उदाहरण – 8

  • चमकत कैधों सूर सूरजा दुधार किधौं, सहर सतारा को सितारा चमकत है?

व्याख्या :- यहाँ छत्रपति शिवाजी का खड़ग चमक रहा है या सतारा नगर (शिवाजी की राजधानी) का भाग्य सूचक सितारा (नक्षत्र) इसके बीच में संदेह हो रहा है.

उदाहरण – 9

सरोवर में यह खिला कमल है या किसी सुंदरी का मुख?

उदाहरण – 10

अँधेरे में लटकती वह डाली है या कोई साँप?

उदाहरण – 11

  • मद भरे ये नलिन नयन मलीन हैं।
  • अल्प जल में या विकल लघु मीन है।।

उदाहरण – 12

दूर पहाड़ी पर टिके ये बादल हैं या उतरी है धुँध की चादर?

उदाहरण – 13

  • चमकत कैधों सूर सूरजा दुधार किधौं,
  • सहर सतारा को सितारा चमकत है ||

उदाहरण – 14

पानी पर झिलमिल ये जुगनू हैं या उतर आए हैं तारे?

उदाहरण – 15

आँगन में बिखरा यह दूध है या चाँदनी?


संदेह और भ्रांतिमान अलंकार में अंतर :-

भावसंदेहभ्रांतिमान
मन की स्थितिदुविधा, निर्णय नहींपक्का (पर ग़लत) निश्चय
पात्र क्या करता हैसोच में पड़ा रहता हैभ्रम के अनुसार कर बैठता है
संकेत शब्दकि, या, अथवा, किधौंजानि, समझकर, मानकर
सरल रूपयह डाली है या साँप?डाली को साँप समझ भाग पड़ा

इनका मुख्य संदेह अन्लंकर में में सवाल बना रहता है और जवाब नहीं मिलता जबकि भ्रांतिमान में जवाब मिल जाता है चाहे गलत ही मिले.


sandeh alankar Ki Paribhasha udaharan FAQ :-

प्रश्न – 1. संदेह अलंकार किसे कहते हैं?
उत्तर :- जब समानता के कारण उपमेय में उपमान का संशय पैदा हो और अंत तक निश्चय न हो, तब संदेह अलंकार होता है।

प्रश्न – 2. संदेह अलंकार का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण कौन-सा है?
उत्तर :- “सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है?” यह सबसे अधिक प्रसिद्ध उदाहरण है।

प्रश्न – 3. संदेह अलंकार के वाचक शब्द कौन-से हैं?
उत्तर :- इसके कि, या, अथवा, किधौं, किंवा जैसे शब्द। कई बार ये न भी हों, तब भी दुविधा वाली स्तथी से पहचान होती है।

प्रश्न – 4. संदेह और भ्रांतिमान अलंकार में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर :- सदेह अन्लंकर में में सवाल बना रहता है और जवाब नहीं मिलता जबकि भ्रांतिमान में जवाब मिल जाता है चाहे गलत ही मिले

प्रश्न – 5. संदेह शब्दालंकार है या अर्थालंकार?
उत्तर :- यह अर्थालंकार है, क्योंकि इसका अर्थ दुविधा है।

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