इस पोस्ट में हमने आपको वीर रस किसे कहते हैं? Veer RAS की परिभाषा, भाव, चार भेद और वीर रस के उदाहरण सरल हिंदी में आपको समझाने की कोशिश की है.
वीर रस किसे कहते हैं?
वीर रस में काव्य या फिर किसी प्रसंग में वीरता या साहस का भाव प्रकट होता है जिससे हमें उत्साहवर्धन होता है वहां वीर रस विद्यमान होता है.
जब कोई पंक्ति पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाएं, मन में जोश भर जाए और लगे कि अभी उठकर कुछ बड़ा कर गुजरें उस रस को ही वीर रस कहते है.
काव्यशास्त्र के नौ रसों में वीर रस उस भाव का नाम है जो साहस, पराक्रम और उत्साह से भरी रचनाओं को पढ़ते या सुनते समय पाठक के मन में जागता है।
वीर रस क्या है?
वीर रस वह रस है जो युद्ध, धर्म, दान या किसी भी कठिन और साहसिक कार्य के प्रसंग से उत्साह उत्पन्न करता है और काव्य में वीरता, साहस या पराक्रम का ऐसा वर्णन हो कि पढ़ने वाले के भीतर भी जोश जाग उठे तो उसे वीर रस कहलाता है.
वीर रस का वर्ण स्वर्ण या गौर और अधिष्ठाता देवता इंद्र माने गए हैं।
वीर रस का स्थायी भाव:-
रस बनने के लिए एक स्थायी भाव की जरूरत होती है, जो विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होता है वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है।
जैसे :- युद्ध जीतने का उत्साह, धर्म की रक्षा का उत्साह, दुखियों की मदद करने का उत्साह, या दान देने का उत्साह।
वीर रस के अवयव :-
आलंबन विभाव — वह व्यक्ति या स्थिति जिसे देखकर उत्साह जागता है जैसे अत्याचारी शत्रु, दीन-दुखी व्यक्ति, याचक या धार्मिक कर्तव्य।
उद्दीपन विभाव — वे परिस्थितियां जो उत्साह को तीव्र करती हैं जैसे शत्रु का पराक्रम या अहंकार, रणभेरी और युद्ध-वाद्यों की गूंज, यश पाने की इच्छा।
अनुभाव — उत्साह के बाहरी लक्षण- जैसे रोमांच, शरीर में कंपन, गर्वपूर्ण वाणी, शत्रु पर प्रहार करना।
संचारी भाव — साथ में आने-जाने वाले सहायक भाव, जैसे गर्व, उग्रता, धृति (धैर्य), स्मृति, हर्ष और उत्सुकता।
वीर रस के भेद :-
वीर रस को चार भेदों में बांटा गया है।
युद्धवीर — यह सबसे प्रत्यक्ष रूप है, जिसमें युद्ध के मैदान में शत्रु का सामना करने पर उत्साह उत्पन्न होता है। रणभूमि में वीरता, साहस और पराक्रम का चित्रण इसी श्रेणी में आता है।
धर्मवीर — इसमें धर्म, कर्तव्य और सिद्धांतों की रक्षा के लिए जागने वाला उत्साह उत्पन्न होता है।
दानवीर — जब कोई याचक या जरूरतमंद के सामने पूरे उत्साह और उदारता से दान करने का भाव उत्पन्न तो वह दानवीर कहलाता है।
दयावीर — दुखियों और असहायों की सहायता करने, उनका कष्ट दूर करने के उत्साह को दयावीर के अंतर्गत रखा जाता है।

वीर रस के उदाहरण :-Veer Ras Ke 15 Udaharan
उदाहरण- 1
सबसे लोकप्रिय उदाहरण सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “झांसी की रानी” से लिया जाता है —
- बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी,
- खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।
यहां रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध-कौशल और साहस का वर्णन पाठक के मन में भी वही जोश भर देता है यह युद्धवीर का उदाहरण है।
उदाहरण- 2
कायर तुम दोनों ने ही उत्पात मचाया
अरे समझ कर जिनको अपना था अपनाया
तो फिर आओ देखो कैसे होती है बलि
रन यह यज्ञ पुरोहित ओकिलात ओ आकुलि
उदाहरण- 3
रण बीच चौकड़ी भर भर कर
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा का पाला था।।
उदाहरण- 3
संपत्ति समेंर की कुबेर की जो परवे ताहि
तुरंत लुटावत विलंब कर धारे ना
कहै पद्माकर सो हम हय हईं हायिन कै
हल्के हलाचार के वितर विचारै ना
उदाहरण- 4
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदाहरण- 5
देख दधीची ने गाय से चटाकार अंग
जांघ अस्थि दी आस आप स्वर्ग को सिधारा है
शिवी ने कपोल हित मांस तन से काट दिया
मोर ध्वज ने देह ऊपर आप खींच आरा है |
उदाहरण- 6
हाथ गह्यो प्रभु को कमला कहै नाथ कहाँ तुमने चित धारी
तुन्दल खाई मुठी दुई दीन कियो तुमने दुई लोक बिहारी
खाय मुठी तीसरी अब नाथ कहाँ निज वास की आस बिसारी
रंकहीं आप समान कियो अब चाहत आपहिं होय भिखारी।
उदाहरण- 7
करता हुआ बध बेरियों का बैर शोधन के लिए
रन मध्य वह फिरने लगा अतिदिव्या द्धुती धारण किए
उस काल जिस ओर वह संग्राम करने को गया
रथ पथ कहीं भी रूद्र उसका दृष्टि में आया नहीं
सम्मुख हुआ जो वीर वह मार गया तत्क्षण नहीं
उदाहरण- 8
नीर पीवन हेतु गयो सिन्धु किनारा रे
सिन्धुं बीच बसत ग्राह चरणधर पछाड़ा रे
द्वारिका में शब्द गयो शोर भरो भारी
शंख चक्र गदा पदम् गरुण छोड़ा धाय
उदाहरण- 9
जय के दर्द विश्वास थे दीप्तिमान जिनके मुखमंडल
पर्वत को भी खंड कर रजकण कर देने को चंचल
फड़क रहे थे अति प्रचंड भुज दंड शत्रु मर्दन को वह विह्वल
ग्राम ग्राम से निकल निकलकर ऐसे युवक चले दल के दल
उदाहरण- 10
मेवाड़ केसरी देख रहा केवल रण का ना तमाशा था
वह दौड़ दौड़ रण करता था वह मान रक्त का प्यासा था
उदाहरण- 11
चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
करता था भूतल पानी को
राणा प्रताप सर काट काट,
करता था सफल जवानी को।
उदाहरण- 12
मैं सत्य कहता हूं सखे सुकुमार मत जानो मुझे
यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा जानू मुझे
हे सारथे हे द्रौण क्या आवेश में मुझमें कभी
वे भी ना जीतेंगे समर में आज क्या मुझसे
अभी कार्य आगे करना है
उदाहरण- 13
फेहरि ध्वजा फड़की भुजा
बलिदान की ज्वाला उठी
निज मातृ भूमि के मान में
चढ़ मृंड की माला उठी
उदाहरण- 14
सुबह भानु कुल पंकज भानु
कहूँ सुभाऊ न कुछ अभिमानु
जो तुम्हारा अनुशासन पावे
कंदुक इव ब्रह्माण्ड उठावों
उदाहरण- 15
ऐसे बेहाल बेवाइन सों पग, कंटक-जाल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा तुम, आये इतै न किते दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।।
उदाहरण- 16
वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।
हाथ में ध्वज रहे बाल दल सजा रहे,
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।
सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो।
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वीर रस और रौद्र रस में अंतर :-
| वीर रस | रौद्र रस |
|---|---|
| वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है | | रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है। |
| उत्साह में आंखों में सिर्फ विस्तार और चमक आती है। | क्रोध में आंखों में लालिमा और फैलाव के साथ-साथ चेहरे पर संकुचन भी दिखाई देता है। |
| जोश, साहस या कुछ कर गुजरने की भावना उठती है और साथ में युद्ध, संघर्ष, दान या कर्तव्य का जिक्र हो | गुस्से, बदले या दंड देने का भाव प्रमुख हो तो वह रौद्र रस |
निष्कर्ष :-
वीर रस काव्य में जो पाठक के भीतर सोया हुआ साहस जगा देता है वहा वीर रस होता है इसका स्थायी भाव उत्साह है और यह युद्धवीर, धर्मवीर, दानवीर और दयावीर चार प्रकारों में बांटा गया है।
इस पोस्ट में वीर रस के 15 उदाहरण दिए गए हैं और इन सभी उदाहरण में वीर रस के भाव देखते हैं जिससे साहस और उत्साह उत्पन्न होता है तो इन सभी उदाहरण का उपयोग करके आप वीर रस को अच्छे से तैयार कर सकते हैं.
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Veer Ras FAQ :-
प्रश्न :- 1 वीर रस का स्थायी भाव क्या है?
उत्तर:- वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है, जो युद्ध, धर्म, दान या दया के प्रसंग में पूरी तीव्रता के साथ प्रकट होता है।
प्रश्न :- 2 वीर रस के कितने भेद होते हैं?
उत्तर:- वीर रस के चार भेद होते हैं — युद्धवीर, धर्मवीर, दानवीर और दयावीर।
प्रश्न :- 3 वीर रस और रौद्र रस में क्या अंतर है?
उत्तर:- वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है जबकि रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है। वीर रस साहस और पराक्रम से जुड़ा है, जबकि रौद्र रस गुस्से और प्रतिशोध से।
प्रश्न :- 4 वीर रस का अधिष्ठाता देवता कौन माना गया है?
उत्तर:- वीर रस का अधिष्ठाता देवता इंद्र माना गया है और इसका वर्ण स्वर्ण या गौर बताया गया है।