इस पोस्ट में हम आपको रौद्र रस किसे कहते है, Raudra Ras Ke Udaharan व्याख्या सहित, परिभाषा, अवयव और रौद्र रस और वीर रस में अंतर के बारे में डिटेल में समझाने वाले है.
रौद्र रस किसे कहते है :-
जब किसी काव्य को सुनने पर या किसी प्रसंग को सुनने पर मन में स्थित क्रोध का भाव उत्पन्न हो तो वहां रौद्र रस होता है.
या फिर किसी शत्रु केआचरण को देखकर या किसी दुराचारी के अत्याचार को देखने के बाद जो मन में क्रोध का भाव उत्पन्न होता है वही रौद्र रस कहलाता है .
रौद्र रस में विभिन्न क्रियाएं उत्पन्न होती हैं जैसे आंखों का लाल होना, होठों का फड़फड़ाना, दांत पीसना त्योरी चढ़ाना, बाहे तन जाना, शरीर का कांपने लग जाना, शस्त्र उठा लेना, जोर-जोर से चिल्लाना, गर्जना आदि सभी अनुभव रौद्र रस में उत्पन्न होते हैं.
रौद्र रस क्या है :- जब किसी व्यक्ति, समाज, धर्म या राष्ट्र का अपमान, अन्याय या तिरस्कार होता है और फिर उसके बाद में मन में जो क्रोध जागता है वही क्रोध जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से जुड़कर जो रस बनता है उसे रौद्र रस कहते हैं।
- रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है।
- आचार्य भानुदत्त ने अपने ग्रंथ रसतरंगिणी में रौद्र रस को क्रोध की पूर्ण और प्रकट होने लगे है जहां सभी इंद्रियां तत्पर हो उठती हैं.
- इस रस का रंग लाल और देवता रुद्र माने गए हैं।
रौद्र रस के अवयव:-
- स्थायी भाव :- क्रोध यही वह मूल भावना है जिसके इर्द-गिर्द पूरा रस बनता है।
- आलंबन विभाव :- वह व्यक्ति या पक्ष जिस पर क्रोध केंद्रित है शत्रु, अन्यायी, देशद्रोही, गुरुद्रोही या दुराचारी व्यक्ति।
- उद्दीपन विभाव :- वे परिस्थितियां जो क्रोध को भड़काती हैं कटु वचन, शत्रु का अपमानजनक व्यवहार, अन्याय या गुरुजनों की निंदा।
- अनुभाव :- क्रोध के कारण शरीर पर दिखने वाले लक्षण जैसे भौंहें चढ़ना या टेढ़ी होना, दांत पीसना, होंठ फड़कना, आंखें लाल हो जाना, मुट्ठियां भिंच जाना।
- संचारी भाव :- क्रोध के साथ आने-जाने वाली सहायक भावनाएं जैसे उग्रता, असहनशीलता, आवेग, चपलता, गर्व।

रौद्र रस के उदाहरण :- Raudra Ras Ka 15 Udaharan
रामचरितमानस के परशुराम-लक्ष्मण संवाद प्रसंग में रौद्र रस का बेहतरीन चित्रण है जब शिव-धनुष टूटने पर क्रोधित परशुराम लक्ष्मण से कहते हैं:-
उदाहरण :- 1
- “रे नृप बालक कालबस, बोलत तोहि न संभार।
- धनुही सम त्रिपुरारि धनु, बिदित सकल संसार॥”
व्याख्या सहित :- यहां आलंबन है लक्ष्मण (जिनके प्रति क्रोध है) उद्दीपन है धनुष का टूटना और लक्ष्मण के तीखे वचन और अनुभाव के रूप में परशुराम के कठोर शब्द उनके क्रोध को व्यक्त करते हैं।
इसके जवाब में लक्ष्मण का उत्तर भी उतना ही तीखा है:
उदाहरण :- 2
- “जो राउर अनुशासन पाऊं।
- कंदुक इव ब्रह्मांड उठाऊं।
- कांचे घट जिमि डारिउं फोरी।
- सकौं मेरु मूलहि सम तोरी॥”
उदाहरण-3
श्री कृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे
सब सुख अपना भूलकर करताल युगल मलने लगे
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठकर खड़े
उस काल मारे क्रोध के तनु कांपने उनका लगा
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा
मुख बाल रवि सभी लाल होकर ज्वात सा बोधित हुआ
प्रलयार्थ उनके मिस वहां क्या काल ही क्रोधित हुआ
व्याख्या सहित :- जब महाभारत में भगवान कृष्ण के द्वारा अर्जुन को प्रवचन सुनने के बाद और अभिमन्यु का वध होने के बाद अर्जुन को अत्यधिक क्रोध कि अनुभूति होती है जिसके बाद वह हाथों का मलना, सभी शत्रुओं मृत्यु की घोषणा करना आदि सभी क्रिया रौद्र रस का उदाहरण है.
उदाहरण-4
मारवे लरवन कुटिव भयी भोंहे, रद पट फरकत नैन रीसोहे
कही न स्काट रघुवीर डर, लगे वचन जनु बान
व्याख्या सहित :- इस उदाहरण में राजा जनक के वचन को सुनकर लक्ष्मण के मन में क्रोध या रौद्र रूप उत्पन्न होता है इसके बाद लक्ष्मण अपनी भोंहे टेढ़ी करना और मन में क्रोध उत्पन्न करना यह भी सभी रौद्र रस उत्पन्न होता है.
उदाहरण-5
बारी टारी डारो कुम्भकर्णहिं बिदारि डारो
मारि मेघनादे आजू यों बल अनंत हौं
कहे पद्माकर त्रिकुट ही को ढाय डारो
डरत करेई जातू फानन कौं अंत हौ
अच्छाहीं निरच्छा कपि ऋच्छाहीं उचारौ इमि
तोज तुच्छ तुच्छं को कछुबे नगत हौ
जारि डारी लंकहि उजारी डारो उपवन
मारी डारी रावन कौ तौ मै हनुमंत हौ
उदाहरण-6
सुन्नत लखन के वचन कटोरा
परशु सुधारि धरेऊ कर धोरा
अब जानि देव दोष मोहई लोगू
कटुवादी बालक वध जोगू
राम बचन सुन कछुक जूड़ाने
कहीं कछु लखन बहुरि मुस्काने
हंसने देख नख शिरव रिस व्यापी
राम तोर भ्राता बड पापी
व्याख्या सहित :- इस उदाहरण में लक्ष्मण के कठोर वचन को कहकर मुस्कुराना उसके बाद परशुराम को क्रोध आना यह रौद्र रस की उत्पत्ति होती है इस प्रकार से इस उदाहरण में रौद्र रस है.
उदाहरण-7
भारत का भूगोल तड़पता, तड़प रहा इतिहास है।
तिनका – तिनका तड़प रहा है, तड़प रही हर सांस है।
सिसक रही है सरहद सारी, मां के छाले कहते हैं।
ढूंढ रहा हूं किन गलियों में, अर्जुन के सूत रहते हैं। ।
व्याख्या सहित :- ऊपर जो उदाहरण दिया गया है उसमे एक व्यक्ति क्रोध के वशीभूत उन कारकों की खोज कर रहा है। जिसके कारण उसकी मां समान मातृभूमि प्रताड़ित है। अपनी मां समान मातृभूमि की रक्षा के लिए अर्जुन जैसे वीरों की खोज की जा रही है। जो मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का सामर्थ्य रखते हैं। इसीलिए यंहा पर रौद्र रस है.
उदाहरण-9
बोरों सबै रघुवंस कुठार की धार में बारण बारज सरतथ्हीं
बाण की वायू उड़ाय के लक्षमण लच्छा करों अरिहा समरतथ्हीं
रामहिं बाम समेत पठे बन कोप के भार में भुजौ भरतथ्हीं
जो धनु हाथ धरै रघुनाथ तौ आजू अनाथ करौ दसरथहिं
व्याख्या सहित :- इस उदाहरण में लक्ष्मण के कठोर वचन को सुनने के बाद उनका मुस्कुराना फिर इस क्रिया से परशुराम क्रोधित होकर रौद्र रूप धारण करके रघुवंश का नाश करूंगा, दशरथ को अनाथ बना दूंगा आदि कथन में रौद्र रस उत्पन्न होता है इस प्रकार से यह उदाहरण भी रौद्र रस का है.
उदाहरण-10
माखे लघन, कुटिल भयी भौंहें ।
रद-पट फरकत नैन रिसौहैं ॥
कहि न सकत रघुवीर डर, लगे वचन जनु बान
नाइ राम-पद-कमल-जुग, बोले गिरा प्रसाद ॥
व्याख्या सहित :- ऊपर दिए उदाहरण में जनक के वचन जो की उद्दीपन-जनक के वचनों की कठोरता इसमें अनुभाव-भौंहें टेढ़ी होना, ओठ फड़कना,नेत्रों का रिसौंहे होना और अब संचारी भाव-अमर्ष, उग्रता आदितो इसीलिए यहाँ पर रौद्र रस है।
उदाहरण-11
फिर दुष्ट दुःशासन समर में शीघ्र सम्मुख आ गया।
अभिमन्यु उसको देखते ही क्रोध से जलने लगा।
निश्वास बारम्बार उसका उष्णतर चलने लगा।
उदाहरण-12
बोले चितई परशु उर औरा
रे सठ सुनाऊ सुभाऊ ना मोरा
बालक बोल बधुऊ नहीं तोही
केवल मुनि जड़ जानेहि मोहि
उदाहरण-13
जब तैं कुमति जियं ठयऊ। खंड-खंड होइ हृदउ न गयऊ।।
बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुँह परेउ न कीरा।।
उदाहरण-14
अंधड़ था बढ़ रहा प्रजादल था झुंझलाता
रण बरसा में शरजों सा बिजली चमकता
किंतु कूर मनु वारण करते उन बाणों का
बदे कुथलते हुए खड़क से जग प्राणों का
उदाहरण-15
उबल उठा शोणित अंगो का, पुतली में उत्तरी लाली।
काली बनी स्वय वह बाला, अलक अलक विषधर काली।।
यह भी पढ़े :-
रौद्र रस और वीर रस में अंतर :-
| वीर रस | रौद्र रस |
|---|---|
| वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है | रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है। |
| वीर रस में व्यक्ति किसी लक्ष्य को पाने के लिए, धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ता है :- जैसे युद्ध में शत्रु का सामना करना या किसी कठिन कार्य को पूरा करने का संकल्प। | रौद्र रस में व्यक्ति किसी अपमान या अन्याय की तात्कालिक प्रतिक्रिया में क्रोधित होना है यह भाव क्षणिक और आवेगपूर्ण होता है। |
| वीर रस संयमित शक्ति का प्रदर्शन है | रौद्र रस आवेश में आया क्रोध है। |
निष्कर्ष :-
रौद्र रस को याद रखने का सबसे आसान तरीका है जहां भी अपमान या अन्याय के कारण जवाब में क्रोध का चित्रण हो और वह क्रोध केवल गुस्सा न रहकर काव्य में एक भाव के रूप में उभरे वहां रौद्र रस है।
इसमें सबसे ज्यादा भ्रमित होने का कारण वीर रस और रौद्र रस में अंतर को पहचानना है जिसे हमने दोनों को अच्छे से साफ साफ बताया है तो इसे अधिक समझाने के लिए रौद्र रस के उदाहरण के द्वारा इसे आप समझ सकते है.
इसी प्रकार से अन्य रस के परिभाषा और उदाहरण के लिए आप हमारे ब्लॉग परिभाषा देखो को बुकमार्क कर ले.
Raudra Ras FAQ :-
प्रश्न :- 1 रौद्र रस का स्थायी भाव क्या है?
उत्तर:- स्थायी भाव क्रोध है।
प्रश्न :- 2 रौद्र रस और भयानक रस में क्या अंतर है?
उत्तर:- रौद्र रस क्रोध पर आधारित है और आलंबन शत्रु या अन्यायी होता है जबकि भयानक रस भय पर आधारित है और आलंबन किसी भयावह वस्तु, प्राणी या परिस्थिति से डर उत्पन्न करता है।
प्रश्न :-3 रौद्र रस के देवता और रंग कौन-से माने गए हैं?
उत्तर:- देवता रुद्र और रंग लाल माना गया है यह भानुदत्त की रसतरंगिणी में वर्णित है।
प्रश्न :- 4 रौद्र रस की पहचान परीक्षा में कैसे करें?
उत्तर:- जिन पंक्तियों में अपमान, अन्याय या शत्रुता के जवाब में क्रोध, तीखे वचन, आंखें लाल होना या दांत पीसने जैसे लक्षण दिखें, वहां रौद्र रस होता है.
प्रश्न :- 5 रौद्र रस किन ग्रंथों में मिलता है?
उत्तर:- रामचरितमानस का परशुराम-लक्ष्मण संवाद और महाभारत के कई युद्ध व अपमान से जुड़े प्रसंग रौद्र रस के उदाहरण हैं।