Anuvad Ki Paribhasha, अनुवाद की परिभाषा Pdf

आज हम जानेंगे Anuvad Ki Paribhasha In Hindi | अनुवाद की परिभाषा | Anuvad Definition In Hindi | अनुवाद का अर्थ | Anuvad Ke Prakar | आपको बताने वाले है.

अनुवाद का अर्थ-

अनुवाद शब्द अंग्रेजी के शब्द ट्रांसलेशन का पर्यायवाची है। इसका अर्थ है–‘पारवहन’।
पार अर्थात् ‘अन्यत्र’ दूसरी ओर’ तथा वहन का अर्थ है ‘ले जाना’। इस प्रकार किसी वस्तु को एक स्थान से अन्यत्र या दूसरी ओर ले जाना ‘ट्रांसलेशन’ कहलाता है।

अंग्रजी शब्दकोष के अनुसार,” एक भाषा के पाठ को दूसरी भाषा में व्यक्त करना ‘ट्रांसलेशन’ कहलाता है।”

‘अनुवाद’ शब्द संस्कृत का यौगिक शब्द है जो ‘अनु’ उपसर्ग तथा ‘वाद’ के संयोग से बना है। संस्कृत के ‘वद्’ धातु में ‘घञ’ प्रत्यय जोड़ देने पर भाववाचक संज्ञा में इसका परिवर्तित रूप है ‘वाद’। ‘वद्’ धातु का अर्थ है ‘बोलना या कहना’ और ‘वाद’ का अर्थ हुआ ‘कहने की क्रिया’ या ‘कही हुई बात’।

अनुवाद की परिभाषा

अनुवाद की परिभाषा विद्वानों के द्वारा –

अनुवाद की परिभाषा विद्वानों के द्वारा को समझने के लिए यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाओं का उल्लेख किया जा रहा है :-

सैमुएल जॉनसन के द्वारा कहा गया है की : ‘मूल भाषा की पाठ्य सामग्री के भावों की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना अनुवाद है।’

जॉन कनिंगटन ने कहा है – अनुवादक को उसके अनुवाद का प्रयत्न तो करना ही है, जिस ढंग से कहा, उसके निर्वाह का भी प्रयत्न करना चाहिए।’

हैलिडे के अनुदार : ‘अनुवाद एक सम्बन्ध है जो दो या दो से अधिक पाठों के बीच होता है, ये पाठ समान स्थिति में समान प्रकार्य सम्पादित करते हैं।’

कैटफोड के अनुसार : ‘एक भाषा की पाठ्य सामग्री को दूसरी भाषा की समानार्थक पाठ्य सामग्री से प्रतिस्थापना ही अनुवाद है।’ जिसके यह तीन भाग है – 1.मूल-भाषा (भाषा) 2. मूल भाषा का अर्थ (संदेश) 3. मूल भाषा की संरचना (प्रकृति)

दंगल झाल्टे के द्वारा : ‘स्रोत-भाषा के मूल पाठ के अर्थ को लक्ष्य-भाषा के परिनिष्ठित पाठ के रूप में रूपान्तरण करना अनुवाद है।’

न्यूमार्क के द्वारा : ‘अनुवाद एक शिल्प है, जिसमें एक भाषा में व्यक्त सन्देश के स्थान पर दूसरी भाषा के उसी सन्देश को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।’

नाइडा के अनुसार :- ‘अनुवाद का तात्पर्य है स्रोत-भाषा में व्यक्त सन्देश के लिए लक्ष्य-भाषा में निकटतम सहज समतुल्य सन्देश को प्रस्तुत करना। यह समतुल्यता पहले तो अर्थ के स्तर पर होती है फिर शैली के स्तर पर।’

रीतारानी पालीवाल ने परिभाषित किया है की : ‘स्रोत-भाषा में व्यक्त प्रतीक व्यवस्था को लक्ष्य-भाषा की सहज प्रतीक व्यवस्था में रूपान्तरित करने का कार्य अनुवाद है।’

भोलानाथ ने परिभाषित किया है की : ‘किसी भाषा में प्राप्त सामग्री को दूसरी भाषा में भाषान्तरण करना अनुवाद है, दूसरे शब्दों में एक भाषा में व्यक्त विचारों को यथा सम्भव और सहज अभिव्यक्ति द्वारा दूसरी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास ही अनुवाद है।’

विनोद गोदरे के अनुसार: अनुवाद, स्रोत-भाषा में अभिव्यक्त विचार अथवा व्यक्त अथवा रचना अथवा सूचना साहित्य को यथासम्भव मूल भावना के समानान्तर बोध एवं संप्रेषण के धरातल पर लक्ष्य-भाषा में अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया है।’

देवेन्द्रनाथ शर्मा ने अनुवाद के बारे में कहा है की : ‘विचारों को एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपान्तरित करना अनुवाद है।’

पट्टनायक के द्वारा :- अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्थक अनुभव (अर्थपूर्ण सन्देश या सन्देश का अर्थ) को एक भाषा-समुदाय से दूसरी भाषा-समुदाय में सम्प्रेषित किया जाता है।’

बालेन्दु शेखर ने कहा है की : अनुवाद एक भाषा समुदाय के विचार और अनुभव सामग्री को दूसरी भाषा समुदाय की शब्दावली में लगभग यथावत् सम्प्रेषित करने की सोद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।’

फॉरेस्टन ने कहा अनुवाद के बारे में कहा : ‘एक भाषा की पाठ्य सामग्री के तत्त्वों को दूसरी भाषा में स्थानान्तरित कर देना अनुवाद कहलाता है। यह ध्यातव्य है कि हम तत्त्व या कथ्य को संरचना (रूप) से हमेशा अलग नहीं कर सकते हैं।’

अनुवाद के प्रकार-

अनुवाद तीन प्रकार के होते है–

1. शब्दानुवाद-

शब्दानुवाद में मूल भाषा का दूसरी भाषा में ज्यों का त्यों अनुवाद किया जाता है। मूल भाषा की शब्द-योजना और वाक्य विन्यास को यथावत् अनुवाद की भाषा में रखा जाता है।

यह शब्दसः उनका अनुवाद होता है अर्थात् वाक्य में प्रयुक्त शब्दक्रम के अनुसार ही अनुवाद में क्रम रखा जाता है।

2. भावानुवाद-

शब्दानुवाद की तुलना में भावानुवाद पाठक को अधिक समझ में आता है। इसमें शब्दों के क्रमानुसार अनुवाद का ध्यान न रखते हुये उस वाक्य या वाक्यों के भावगत पर नजर रखी जाती है और अनुवाद का लक्ष्य मूलभाव को उजागर करना होता है.

3. पर्याय या रूपांतर अनुवाद-

इसमें अनुवादक की पूरी मनमानी रहती है। वह यथेष्ट परिवर्तन करता है। अपनी बातों-विचारों का समावेश करता है, लेकिन मूलपाठ के उद्देश्य अथवा विचार से भटकता नही है बल्कि उसमें नई ऊर्जा और चेतना भर देता है।

अनुवाद के स्वरूप

अनुवाद के स्वरूप-

अनुवाद के स्वरूप के सन्दर्भ में विद्वानों में मतभेद है। इस सम्बन्ध में डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव का मत ग्रहणीय है।

अनुवाद के स्वरूप को दो संदर्भों में बाँटा जा सकता है-

  1. अनुवाद का सीमित स्वरूप-
  2. अनुवाद का व्यापक स्वरूप

1.अनुवाद का सीमित स्वरूप-

अनुवाद की साधारण परिभाषा के अंतर्गत पूर्व में कहा गया है कि अनुवाद में एक भाषा के निहित अर्थ को दूसरी भाषा में परिवर्तित किया जाता है और यही अनुवाद का सीमित स्वरूप है.

अनुवाद का सीमित स्वरूप को दो भाषाओं के मध्य होने वाला ‘अर्थ’ का अंतरण माना जाता है।

अनुवाद का सीमित स्वरूप में अनुवाद के दो आयाम होते हैं-

  1. पाठधर्मी आयाम
  2. प्रभावधर्मी आयाम
1.1 पाठधर्मी आयाम-

पाठधर्मी आयाम के अंतर्गत अनुवाद में स्रोत-भाषा पाठ केंद्र में रहता है जो तकनीकी एवं सूचना प्रधान सामग्रियों पर लागू होता है।

1.2 प्रभावधर्मी आयाम-

प्रभावधर्मी अनुवाद में स्रोत-भाषा पाठ की संरचना तथा बुनावट की अपेक्षा उस प्रभाव को पकड़ने की कोशिश की जाती है जो स्रोत-भाषा के पाठकों पर पड़ा है.

2.अनुवाद का व्यापक स्वरूप :

अनुवाद के व्यापक स्वरूप में अनुवाद को दो भिन्न प्रतीक व्यवस्थाओं के मध्य होने वाला ‘अर्थ’ का अंतरण माना जाता है।

अनुवाद का व्यापक स्वरूप को तीन वर्गों में बाँटे गए हैं-

  1. अंत:भाषिक अनुवाद (अन्वयांतर),
  2. अंतर भाषिक (भाषांतर),
  3. अंतर प्रतीकात्मक अनुवाद (प्रतीकांतर)
2.1 अंत:भाषिक-

‘अंत:भाषिक’ का अर्थ है एक ही भाषा के अंतर्गत। अर्थात् अंत:भाषिक अनुवाद में हम एक भाषा के दो भिन्न प्रतीकों के मध्य अनुवाद करते हैं।

2.2 अंतर भाषिक –

अंतर भाषिक अनुवाद में अनुवाद को न केवल स्रोत-भाषा में लक्ष्य-भाषा की संरचनाओं, उनकी प्रकृतियों से परिचित होना होता है, वरन् उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, धार्मिक विश्वासों, मान्यताओं आदि की सम्यक् जानकारी भी उसके लिए बहुत जरूरी है।

2.3 अंतर प्रतीकात्मक –

अंतर प्रतीकात्मक अनुवाद में प्रतीक-1 का संबंध तो भाषा से ही होता है, जबकि प्रतीक-2 का संबंध किसी दृश्य माध्यम से होता है।

अनुवाद का महत्त्व-

वर्तमान समय में विभिन्न स्तरों पर अनुवाद के द्वारा आपसी संपर्कों को बढ़ावा दिया गया है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवाद के पतन के साथ, कई छोटे और बड़े देश स्वतंत्र हो गए और स्वतंत्र सरकारें बन गईं।

विकास के लिए, ज्ञान के नए स्रोतों से परिचित होने और विश्व स्तरीय विचारकों से अंतर्दृष्टि प्राप्त करने के लिए आपसी संपर्क आवश्यक थे जिसमें अनुवाद अपनी अहम् भूमिका निभा रहा है.

अनुवाद के द्वारा ही आज विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ रहे हैं।

लोग अध्ययन के लिए विदेश जाते हैं, व्यापारिक और औद्योगिक संगठन विभिन्न देशों में काम करते हैं, विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले लोग सम्मेलनों में बैठते हैं और बात करते हैं, राष्ट्राध्यक्ष सद्भावनापूर्ण दौरों के लिए दूसरे देशों की यात्रा करते हैं। इन सबके लिए अनिवार्य रूप से अनुवाद की आवश्यकता होती है।

वर्तमान में, शिक्षा के क्षेत्र में कई पाठ्यक्रम एक विशेष भाषा में उपलब्ध हैं और उन्हें सभी के लिए सुलभ बनाने के लिए स्थानीय भाषा में अनुवाद करने की बहुत आवश्यकता है।

अनुवाद की परिभाषा

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निकर्ष-

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