Drishtant Alankar Ki Paribhasha, दृष्टान्त अलंकार की परिभाषा

आज हम जानेगे की Drishtant Alankar Ki Paribhasha In Hindi, दृष्टान्त अलंकार की परिभाषा, दृष्टान्त अलंकार के उदाहरण और दृष्टान्त अलंकार का अर्थ आपको हम इसमें बताने वाले है.

Drishtant Alankar Ki Paribhasha-

आज हम यंहा पर आपको दृष्टान्त अलंकार किसे कहते है | दृष्टान्त अलंकार क्या है | Definition Of Drishtant Alankar In Hindi, Drishtant Alankar Ke Udaharan vyakhya sahit बताने वाले है.

दृष्टान्त अलंकार में पहले कोई बात कहकर, उससे मिलती-जुलती समान बात द्वारा समझाया दिया जाय लेकिन फिर भी समानता किसी शब्द द्वारा प्रकट न हो वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है।

जिस काव्य में दो सामान्य या दोनों विशेष वाक्य में बिम्ब- प्रतिबिम्ब भाव होता है, उस काव्य को दृष्टान्त अलंकार होता है।

जब किसी काव्य में एक ही भाव या उससे जुडी आशय की दो बातें कहीं जाएं वेह काव्य दृष्टान्त अलंकार कहलाता है.

दृष्टांत अलंकार में उपमेय और उपमान में बिंब, प्रतिबिंब भाव की समानता पाई जाती है इसी कारन से इसे दृष्टान्त अलंकार के नाम से जानते है.

Drishtant Alankar Ki Paribhasha
Drishtant Alankar Ki Paribhasha

दृष्टान्त अलंकार की परिभाषा संस्कृत में –

दृष्टान्त अलंकार का संस्कृत अर्थ ” दृष्टांतः पुनरेतेषां सर्वेषां प्रतिबिम्बनम् ” – जब वाक्य में उपमान, उपमेय, उनके विशेषण और साधारण धर्म का भिन्न होते हुए भी औपम्य के प्रतिपादनार्थ उपमान वाक्य तथा उपमेय वाक्य में पृथगुपादानरूप बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव प्रकट होते है वेह दृष्टांत अलंकार होता है।

जैसे-

तवाहवे साहसकर्मशर्मणः करं कृपाणान्तिकमानिनीषतः ।।
मटाः परेषां विशरारूतामगः दधत्यवातेस्थिरतां हि पासवः ।

स्पष्टीकरण व्याख्या सहित– यहाँ ‘धूल’ तथा ‘शत्र सैनिकों का और पलायन एवं अस्थिरत्व का बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव है।

Drishtant Alankar Ke Udaharan
Drishtant Alankar Ke Udaharan

Drishtant Alankar Ke Udaharan vyakhya sahit-

उदाहरण –

सठ सुधरहिं सत संगति पाई।
पारस परस कुधात सुहाई ॥

व्याक्या – यहाँ सत्संगति से सठ का सुधरना वैसा ही है, जैसे पारसमणि के स्पर्श से कुधातु का चमकना।
यहाँ प्रथम वाक्य की सत्यता साबित करने के लिए दृष्टान्त रूप से दूसरा वाक्य आया है।

उदाहरण–

सुख-दुःख के मधुर मिलन से,
यह जीवन हो परिपूरण ।।
फिर घन में ओझल हो शशि ।
फिर शशि से ओझल हो घन।।

स्पष्टीकरण व्याक्या सहित–

यहाँ सुख-दुःख सत्यता साबित करने के लिए दृष्टान्त रूप से दूसरा वाक्य शशि-घन
आया है। इसलिए यहाँ दृष्टांत अलंकार है।

उदाहरण–

निरखि रूप नंदलाल को दृगनि रचै नहि आन।
तजि पीयूष कोई करत कटु औषधि को पान।

व्याक्या सहित स्पष्टीकरण–

जिन आँँखों ने नंदलाल को देख लिया है, उन्हें भला और कोई कैसे अच्छा लग सकता है? क्या अमृत को त्याग कर कोई कड़वी औषधि को पसंद कर सकता है। यहांँ प्रथम वाक्य का दृष्टान्त दूसरे वाक्य में झलकता है।अतः यहाँँ दृष्टांत अलंकार है।

उदाहरण-

एक म्यान में दो तलवारें,
कभी नहीं रह सकती है।
किसी और पर प्रेम नारियाँ,
पति का क्या सह सकती है।।

इस अलंकार में एक म्यान दो तलवारों का रहना वैसे ही असंभव है जैसा कि एक पति का दो नारियों के साथ में रहना। अतः यहाँ बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव दृष्टिगत हो रहा है।

उदाहरण-

सिव औरंगहि जिति सकै, और न राजा-राव।
हत्थि-मत्थ पर सिंह बिनु, आन न घालै घाव।।

स्पष्टीकरण व्याक्या सहित –

यंहा पर प्रथम वाक्य कहा गया है की छत्रपति शिवाजी ही औरंगजेब को जीत सकते है अन्य राजा नहीं को साबित करने के लिए दूसरी बात जो पहली बात से मिलती-जुलती है, कि हाथी के मस्तक पर सिंह ही घाव कर सकता है और कोई नहीं इसे दृष्टान्त के रूप में देखा गया है.

उदाहरण-

सठ सुधरहिं सत संगति पाई।
परस परसि कुधातु सुहाई।।

व्याक्या सहित स्पष्टीकरण–

यंहा प्रथम वाक्य सत्संगति से दुष्ट भी उस प्रकार सुधर जाते हैं इसे दुसरे वाक्य पारस के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है इसे प्रतिबिम्ब के द्वारा बताया है.

उदाहरण–

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्याप्त नहीं, लिपटे रहत भुजंग ।।

व्याक्या

जो मनुष्य उत्तम प्रकृति का होता है उस पर दुष्ट व्यक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जिस प्रकार चंदन के वृक्ष पर विषैले सर्प लिपटे रहते हैं, किंतु उसकी सुगंध पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

यहाँँ पर पहली पंक्ति की बात को दूसरी पंक्ति के उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया गया है। अत: यहाँँ दृष्टांत अलंकार है।

उदाहरण-

भरतहिं होइ न राजमदु, विधि हरि पद पाई ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि, छीर सिन्धु बिनसाई ।।

व्याक्या सहित

यंहा पर बताया गया है की ब्रह्म, विष्णु तथा महेश का पद पाकर भी भरत को राजमद(अयोध्या) का घमंड नहीं हो सकता उसी प्रकार दूसरी वाक्य में
साबित किया गया है की भला खटाई की थोङी बूँदों से क्या क्षीर समुद्र नहीं फट सकता है जिनमें एक दूसरे से मिलती-जुलती बातें कहीं गई है, अतः यहाँ दृष्टान्त अलंकार है।

दृष्टान्त अलंकार का अन्य उदाहरण –

  • दुसह दुराज प्रजानु को क्यों न बढ़े दुःख द्वन्द्व ?
  • अधिक अँधेरौ जग करै, मिलि मावस रवि चन्द |
  • कन कन जोरै मन जुरै, खावत निबरे सोय।
  • बूँद-बूँद तें घट भरै, टपकत रीतो होय।।
  • सुख-दुःख के मधुर मिलन से,
  • यह जीवन हो परि पुरन।
  • फिर धन में ओझल हो शशि,
  • फिर राशि में ओझल हो घन ॥ “
  • श्रम ही सों सब मिलत है, निन श्रम मिलै न काहि।
  • सीधी अंगुरी घी जम्यो, क्यों हू निकसत नांहि।।
  • बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
  • रहिमन फाटे दूध को, मथै न माखन होय।।
  • मनुष जनम दुरलभ अहै, होय न दूजी बार।
  • पक्का फल जो गिरि परा, बहुरि न लागै डार।।
  • रूप नंदलाल को, दृगानि रचै नहि आन।
  • तजि पीयूष कोउ करत, कटु औषधि को पान।
  • पानी मनुज भी आज मुख से राम नाम निकालते।
  • देखो भयंकर भेङिये भी, आज आँसू ढालते।।
  • रहिमन अँसुवा नयन ढरि, जिय दुख प्रकट करेइ।
  • जाहि निकारौ गेह तें, कस न भेद कहि देइ।।
  • परी प्रेम नंदलाल के, हमहिं न भावत जोग।
  • मधुप राजपद पाय के, भीख न मांगत लोग।।
  • करत-करत अभ्यास के, जङमति होत सुजान।
  • रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।।

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निकर्ष-

  • जैसा की आज हमने आपको Drishtant Alankar Ki Paribhasha, दृष्टान्त अलंकार की परिभाषा, Drishtant Alankar Ke Udaharan जानकारी के बारे में आपको बताया है.
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