Sansmaran Ki Paribhasha Pdf, संस्मरण की परिभाषा और उदाहरण

आज हम जानेंगे Sansmaran Ki Paribhasha In Hindi | संस्मरण की परिभाषा | Sansmaran Definition In Hindi | संस्मरण का अर्थ | Sansmaran Ke Prakar | आपको बताने वाले है.

Sansmaran Ki Paribhasha-

अब आपको हम यंहा पर संस्मरण संधि क्या है, Sansmaran Ki Paribhasha dijiye, संस्मरण किसे कहते है | संस्मरण के उदाहरण बारे में बताने वाले है जो की आपके एग्जाम यह जानकारी अवस्य काम आएगी-

संस्मरण साहित्य की एक विधा है इसमें लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभव को भावप्रवणता के साथ इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि उसका एक चित्र बन जाता है ।

संस्मरण प्रायः महान् व्यक्तियों के ही लिखे जाते हैं । इसका सम्बन्ध देशकाल तथा पात्र दोनों से होता है।
इसमें लेखक वर्ण्य-विषय के साथ-साथ अपने विषय में भी कुछ-न-कुछ कहता चलता है।
इसमें शैली निश्चित नहीं होती। इसमें लेखक जैसा देखता है, अनुभव करता है, वैसा ही वर्णन करता है।

संस्मरण भी साहित्य की एक विधा है और बहुत से विद्धानों ने जीवन के अपने अनुभव, अपने संघर्ष और अपनी सफलताओं को साहित्य में संस्मरणों के रूप में लिख कर अमर कर दिया हैं उसे ही संस्मरण कहते है.

महादेवी वर्मा की ‘स्मृति की रेखाएं’ और ‘अतीत के चलचित्र’ शिवानी की ‘जालक’, ‘कैंजा’, तथा नरेन्द्र कोहली की ‘स्मरामि’ आदि संस्मरण साहित्य की उल्लेखनीय कृतियाॅं हैं।

Sansmaran Ki Paribhasha

संस्मरण का अर्थ –

संस्मरण शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, सम् + स्मरण। इसका अर्थ सम्यक् स्मरण अर्थात् किसी घटना, किसी व्यक्ति अथवा वस्तु का स्मृति के आधार पर कलात्मक वर्णन करना संस्मरण कहलाता है।
इसमें स्वयं अपेक्षा उस वस्तु की घटना का अधिक महत्व होता है जिसके विषय मे लेखक संस्मरण लिख रहा होता हैं।
संस्मरण की सभी घटनाएं सत्यता पर ही आधारित होती हैं।

संस्मरण का परिभाषा विद्वानों द्वारा –

डॉ. आशा गुप्त के अनुसार— अतीत के धूमिल चित्रों की साकार अभिव्यक्ति ही संस्मरण कहलाता है.

डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत ने बताया है की – भावुक कलाकार जब अतीत की अनन्त स्मृतियों में से कुछ स्मरणीय अनुभूतियों की अपनी कोमल कल्पना से अनुरंजित कर व्यंजनामूलक संकेत शैली में अपने व्यक्तित्व की विशेषताओं से वेष्ठित कर रोचक ढंग से यथार्थ में व्यक्त कर देता है, तब उसे संस्मरण कहते हैं।”

डॉ. ओमप्रकाश शास्त्री ने बताया-, “अतीत की अनन्त घटनाओं में जब कलाकार किसी अधिक स्मरणीय, विस्तरणीय घटना को अपने व्यक्तित्व में रंगकर रोचक शैली में यथार्थ रूप से प्रस्तुत करता है, तो उसे संस्मरण कहते हैं।”

डॉ. नरेश लावनिया ने परिभाषित किया है की – जब व्यक्ति या घटना की स्मृति वर्षों के व्यवधान के पश्चात् भी मस्तिष्क के किसी कोने में अपना स्थान बनाए रखती है तो साहित्यकार उस स्मृति को साहित्योचित रूप से अभिव्यक्ति प्रदान करके संस्मरण विधा की रचना करता है ।”

डॉ. शान्ति स्वरूप गुप्त के अनुसार — भावुक कलाकार जब अतीत की अनन्त स्मृतियों में कुछ स्मरणीय अनुभूतियों को अपनी कोमल कल्पना से अनुरंजित कर व्यंजनामूलक संकेत शैली में व्यक्त करता है, तब उसे संस्मरण कहते हैं ।

डॉ. भगवतशरण भारद्वाज के द्वारा- व्यक्तिगत सम्पर्क के आधार पर तथ्यात्मक पद्धतियों का त्यागकर जब किसी व्यक्ति के जीवन की चारित्रिक निजताओं को प्रकट करने वाली रोचक या मार्मिक घटनाओं को क्रमबद्ध किया जाता है, तो उसे संस्मरण के नाम से अभिहित करते हैं।”

डॉ. भगीरथ मिश्र के अनुसार– संस्मरण प्रायः किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के होते हैं और प्रायः मृत्यु के उपरांत लिखे जाते हैं।”

डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत के अनुसार—“ भावुक कलाकार जब अतीत की अनन्त स्मृतियों में से कुछ स्मरणीय अनुभूतियों को अपनी कला से अनुरंजित करके रोचक ढंग से यथार्थ रूप में व्यक्त करता है, तब उसे संस्मरण कहते हैं।”

डॉ. हरिमोहन ने कहा है –“संस्मरण गद्य की वह जीवनपरक कथेतर गद्य विधा है, जिसमें कोई लेखक किसी विशिष्ट व्यक्ति के जीवन से जुड़ी मार्मिक, आत्मीय स्मृतियों को रोचक तथा / तथ्यपरक ढंग से वर्णित करता है।

डॉ. रामगोपाल चौहान के द्वारा —”संस्मरण में लेखक किसी ऐसी घटना, भाव या व्यक्ति से सम्बन्धित निजी अनुभूति की स्मृति का साकारता प्रदान करता है,
जो अंदर ही अंदर उसके मन को कुरेदती रहती है और अभिव्यक्ति के लिए उसके मन, प्राण को उद्वेलित करती रहती है । यह अभिव्यक्त होकर संस्मरण का रूप धारण करती है । “

डॉ. शंकर देव अवतरे के अनुसार- ” संस्मरण के आत्म-संस्मरण और पर-संस्मरण दोनों रूप होते हैं, जो क्रमशः आत्मकथा और जीवनी के उसी प्रकार संक्षिप्त रूप है;

जैसे—उपन्यास का कहानी, नाटक का एकांकी और महाकाव्य का खण्डकाव्य है।”

संस्मरण के उदाहरण

संस्मरण के उदाहरण –

उदाहरण 1-

होलोकॉस्ट से बचे टॉम बर्गेंथल, जो आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश बने, ने ऑशविट्ज़ में अपने समय के बारे में एक संस्मरण लिखा।
पुस्तक में, बर्गेंथल एक उल्लेखनीय कहानी बताता है कि कैसे वह दस साल के लड़के के रूप में मृत्यु शिविर से बच गया, और कैसे इस अनुभव ने उसे अन्य बच्चों को ऐसी भयावहता से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया।

उदाहरण 2-

सेंट ऑगस्टीन का कन्फ़ेशन ईसाई धर्मशास्त्र के सबसे प्रभावशाली कार्यों में से एक है, और यह एक संस्मरण भी है।
पुस्तक में, ऑगस्टाइन अपने जीवन की कहानी बताता है और बताता है कि कैसे उसने अपनी युवावस्था पाप में डूबे रहने के बाद भगवान को पाया।
इस पुस्तक ने अनगिनत लोगों को अपने विश्वास के प्रति प्रतिबद्ध होने के लिए प्रेरित किया है, और प्रेम, नैतिकता और स्वतंत्रता जैसी अवधारणाओं की पश्चिमी दार्शनिक समझ को प्रभावित किया है।

संस्मरण का इतिहास-

संस्मरण का परिभाषा

संस्मरण के प्रकार-

संस्मरण दो प्रकार के होते हैं।

  • आत्म संस्मरण
  • दूसरे से सुनकर लिखे गए संस्मरण

1.-आत्म संस्मरण-

आत्म संस्मरण के केन्द्र में लिखने वाला व्यक्ति मुख्य होता हैं। वह अपनी स्मृति से, अपने देखे, सुने या भोगे हुए यथार्थ को लिखता है।

2. दूसरे से सुनकर लिखे गए संस्मरण-

जबकि दूसरे से सुन कर लिखे जाने वाले संस्मरण में लेखक किसी व्यक्ति से बातचीत करके, उसकी स्मृति को टटोल कर, उसे लिपिबद्ध करता है।

संस्मरण की विशेषता-

संस्मरण का परिभाषा

प्रथम संस्मरण और प्रथम संस्मरणकार कौन है-

> हिन्दी के प्रथम संस्मरणकार पद्मसिंह शर्मा हैं। इनकी प्रमुख रचना ‘पद्म पराग’ सन् 1929 ई० में प्रकाशित हुई।

प्रमुख संस्मरण और इनके संस्मरणकार-

2010जे॰ एन॰ यू॰ में नामवर सिंहसं॰ सुमन केशरी
2010बैकुंठ में बचपनकान्तिकुमार जैन
2011अतीत रागनन्द चतुर्वेदी
2011कल परसों बरसोंममता कालिया
2011स्मृति में रहेंगे वेशेखर जोशी
2012अपने-अपने अज्ञेय [दो खंड]ओम थानवी
2012आलोचक का आकाशमधुरेश
2012माफ़ करना यारबलराम
2012स्मृतियों के गलियारे सेनरेन्द्र कोहली
2013मेरी यादों का पहाड़देवेंद्र मेवाड़ी

Sansmaran Ki Paribhasha Pdf-

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निकर्ष-

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